मिलावटखोर सावधान! लखनऊ से आ रही ‘सीक्रेट टीम’, रेड की जगह का पता WhatsApp पर पहुंचेगा

संवाद सहयोगी, बहजोई (संभल)। त्योहारों पर मिठाइयों और दूध से बने उत्पादों की मांग बढ़ने के साथ ही मिलावट का खतरा भी बढ़ जाता है। लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने वाले मिलावटखोरों पर शिकंजा कसने के लिए खाद्य सुरक्षा विभाग ने छापेमारी की व्यवस्था में बदलाव किया है। अब लखनऊ मुख्यालय से गोपनीय टीमें गठित कर दूसरे जिलों में भेजी जा रही हैं।

टीमों को संबंधित जनपद में पहुंचने के बाद ही छापेमारी के लिए प्रतिष्ठानों की सूची दी जाती है। इस व्यवस्था का मकसद कार्रवाई की भनक पहले से कारोबारियों को न लगने देना और सूचना लीक होने की आशंका को खत्म करना है।

प्रदेश के सभी जिलों से खाद्य सुरक्षा विभाग के निरीक्षकों, मुख्य खाद्य सुरक्षा अधिकारियों और सहायक आयुक्त खाद्य सुरक्षा के नाम पहले ही मंगा लिए जाते हैं। इसके बाद अधिकारियों की ड्यूटी दूसरे जनपदों में लगाई जाती है।

हालांकि, उन्हें पहले से यह जानकारी नहीं होती कि उनकी तैनाती किस जिले और किस तहसील में होगी। निर्धारित दिन टीम को दूसरे जनपद पहुंचने के निर्देश दिए जाते हैं।

वहां पहुंचने के बाद वाट्सएप के माध्यम से चिन्हित प्रतिष्ठानों की सूची उपलब्ध कराई जाती है और तत्काल छापेमारी शुरू कर दी जाती है। कार्रवाई के दौरान अधिकारियों के मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी प्रतिबंध रहता है, ताकि छापेमारी की सूचना पहले से कारोबारियों तक न पहुंचे।

पूरी कार्रवाई की निगरानी के लिए मंडल स्तरीय अधिकारियों को भी जिम्मेदारी दी गई है। जिले में पिछले तीन दिनों से बाहरी जनपदों की टीमें जांच कर रही हैं।

अब तक करीब छह प्रतिष्ठानों पर छापेमारी कर खाद्य पदार्थों के नमूने लिए जा चुके हैं। वहीं, जिले के खाद्य सुरक्षा अधिकारियों को भी दूसरे जनपदों में भेजा गया है।

दूध से बने उत्पादों पर विशेष फोकस
फिलहाल खाद्य सुरक्षा विभाग का विशेष फोकस मावा और दूध से बने उत्पादों पर है। मिठाई, पनीर और अन्य दुग्ध उत्पादों में मिलावट की आशंका को देखते हुए प्रतिष्ठानों की जांच की जा रही है।

रसगुल्ला, पनीर और मावा जैसे उत्पादों के नमूने लेकर उनकी गुणवत्ता परखी जा रही है। त्योहारों के दौरान मिलावट पर अंकुश लगाने के लिए विभाग की टीमें लगातार सक्रिय हैं।

सहायक आयुक्त खाद्य सुरक्षा मानवेंद्र सिंह ने बताया कि टीमों का गठन लखनऊ मुख्यालय से किया जा रहा है। अधिकारियों को ड्यूटी की जानकारी पहले दे दी जाती है, लेकिन छापेमारी के स्थान का पता संबंधित जनपद में पहुंचने के बाद ही चलता है। इससे कार्रवाई को गोपनीय रखने में मदद मिलती है।

 

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