वाराणसी-नई दिल्ली वंदे भारत स्लीपर: पहिए और पटरियां वही, बस भारत बदल गया …

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 सन् 1853 की वह वैशाखी दोपहर बरबस याद आती है, जब बोरीबंदर से ठाणे के बीच लोहे के पहियों ने पहली बार भारत की छाती पर गति की लकीर खींची थी। धुएं के घने गुबार, भाप की तीखी सीटी और छुक-छुक की गड़गड़ाहट के बीच उस दिन खड़े देश ने विस्मय से आंखें मलते हुए ‘लोहे के दैत्य’ को देखा था। किसी ने हाथ जोड़े थे, तो किसी ने उस रहस्यमयी रफ्तार को कौतूहल से तकते हुए एक नए युग की आहट महसूस की थी।

आज करीब पौने दो सौ साल बाद, जब प्रयागराज जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर छह पर ढोल-नगाड़ों की थाप, वैदिक मंत्रोच्चार और शंखनाद के बीच उत्तर भारत की पहली वंदे भारत स्लीपर रवाना हुई, तो इतिहास ने खुद को सर्वथा नए और गौरवमयी रूप में दोहराया। ट्रेन के रवानगी लेते ही पूरा स्टेशन परिसर तालियों और हर हर महादेव, हर हर गंगे की जयकारो से गूंज उठा।

कोच के भीतर कदम रखते ही बाहर का शोर एकदम थम गया; मानो किसी शांत, आधुनिक विला की गैलरी में प्रवेश कर गए हों। सौम्य प्रकाश, खुशबूदार वातानुकूलित हवा और मखमली शयन बर्थ भारत की बदलती तस्वीर बयां कर रहे थे। खिड़की के चौड़े शीशे से बाहर अंधेरे में बिजली की मानिंद पीछे छूटते वृक्षों और खेतों को देख सातवीं कक्षा के शिवांश त्रिपाठी की आंखें चमक उठीं। उसने उत्साह से कहा – भैया, ऐसा लग रहा है हम किसी उड़ते हुए होटल में हैं! किताबों में सुना था कि पहली ट्रेन कोयले से चलती थी, पर यह तो बिना हिले-डुले जादू की तरह उड़ रही है।

बगल की लोअर बर्थ पर तसल्ली से बैठे 74 वर्षीय अवकाश प्राप्त शिक्षक उमाकांत द्विवेदी अतीत में खोए थे। चेहरे पर संतोष की लकीरें लिए उन्होंने कहा-बाबू, हमने वो जमाना देखा है जब भाप वाले इंजन से उड़ती कालिख आंखों में चुभती थी और काठ की कठोर सीटों पर करवट बदलते-बदलते रात कटती थी। आज अपनी आंखों से इस हिंदुस्तान को स्लीपर वंदे भारत पर तैरते देखना एक सपने के सच होने जैसा है। यह केवल गति नहीं, हमारे आत्मसम्मान की उड़ान है।

वहीं, अपने लैपटाप बैग को सहेजते हुए दिल्ली में कार्यरत अधिवक्ता वर्तिका सिंह की मुस्कान ने आधुनिक भारत की नब्ज पकड़ ली। वे बोलीं-एक महिला के नाते जो सुरक्षा, स्वच्छता और सहजता इस ट्रेन में महसूस हो रही है, वह अप्रतिम है। बायो-टायलेट, आटोमैटिक दरवाजे और यह कंपन-रहित शांति-हम रातभर सोकर सुबह तरोताजा दिल्ली उतरेंगे। यह बदलता हुआ नया भारत है।

रात की खामोशी में जब ट्रेन पूरी गति से पटरियों पर फिसली, तो हाथ में रखी चाय की प्याली भी अडिग रही। बाहर भूगोल दौड़ रहा है और भीतर जाग रहा है एक नया आत्मविश्वास। यह महज लोहे और पहियों का संयोजन नहीं, यह भाप के युग से निकलकर आत्मनिर्भरता के अंतरिक्ष में छलांग लगाते हिंदुस्तान का स्वप्न-यान है।

जब गदर के साए में बिछी थी कानपुर-इलाहाबाद पटरी…

वर्ष 1859 की तीन मार्च की तारीख भारतीय रेल के इतिहास का एक बेहद अहम पन्ना है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के तुरंत बाद ब्रिटिश हुकूमत ने अपनी सैन्य पकड़ मजबूत करने और अवध व पश्चिमोत्तर प्रांतों पर शिकंजा कसने के लिए इलाहाबाद से कानपुर के बीच 180 किलोमीटर लंबी लोहे की पटरी बिछाकर पहली यात्री ट्रेन दौड़ाई थी। उस दौर में ईस्ट इंडिया रेलवे के अंग्रेज हुक्मरानों और कौतूहल से कांपते मुसाफिरों ने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि जिस औपनिवेशिक नियंत्रण और धुएं उगलते भाप के इंजनों के लिए यह ट्रैक तैयार हुआ था, पौने दो सौ साल बाद स्वतंत्र भारत की मेधा उसी राह पर विश्वस्तरीय ‘वंदे भारत स्लीपर’ दौड़ाकर नए युग का इतिहास लिखेगी।

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