सेब के पेड़ों के दुश्मन की उल्टी गिनती शुरू, कश्मीर की मिट्टी में मिले 5 ‘रक्षक’; लार्वा को मारने में सक्षम

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सेब के पेड़ों को खोखला कर उनकी पैदावार और गुणवत्ता बिगाड़ने वाले खतरनाक कीट से निपटने का रास्ता कश्मीर की मिट्टी में ही छिपा है। कश्मीर के विज्ञानियों के एक शोध में मिट्टी में पाए जाने वाले पांच स्थानीय सूक्ष्म कीटों की पहचान हुई है, जो सेब के तना छेदक कीट एओलोस्थीज सार्टा के लार्वा को मारने में सक्षम हैं। प्रयोगशाला में मिले परिणामों से उम्मीद जगी है कि भविष्य में सेब उत्पादकों की महंगे रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम हो सकती है।

जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के सेब बागानों में यह कीट गंभीर नुकसान पहुंचाता है। इसके लार्वा पेड़ों के तनों और शाखाओं में घुसकर उन्हें खोखला कर देते हैं। इससे पेड़ कमजोर पड़ जाते हैं, शाखाएं टूटने लगती हैं। अधिक संक्रमण होने पर पेड़ सूख सकते हैं। इसका असर सीधे पैदावार और फलों की गुणवत्ता पर पड़ता है।

कीट से बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाले रासायनिक कीटनाशक बागवानों का खर्च बढ़ाते हैं और पर्यावरण व स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता पैदा करते हैं। स्थानीय उत्पादकों और कृषि विज्ञानियों के अनुसार, बीते वर्ष लगभग 30 प्रतिशत बागों में इसका प्रकोप रहा है। यह पुराने पेड़ों पर जल्दी हमला करता है। अमेरिकन और डिलशियस सेब इससे ज्यादा प्रभावित हुआ है।

450 नमूनों की जांच में मिले पांच उपयोगी सूक्ष्म कृमि

यह शोध इजिप्शियन जर्नल आफ बायोलाजिकल पेस्ट कंट्रोल में प्रकाशित हुआ है। कश्मीर के सेब बागान में पाए जाने वाले सूक्ष्म कीटों की पहचान और सेब के खतरनाक कीट के खिलाफ उनकी प्रभावशीलता पर हुए अध्ययन ने सेब बागवान के लिए खुशखबरी ला दी है। नुसरत फातिमा के नेतृत्व में नौ शोधकर्ताओं की टीम ने कुपवाड़ा, बांडीपोरा और बारामुला जिलों के सेब बागान से मिट्टी के 450 नमूने एकत्र किए। जांच में पांच नमूनों में सूक्ष्म कीट मिले।

शोध दल में नुसरत फातिमा, तारिक हसन अस्करी, विशाल सिंह सोमवंशी, महफूज अब्देलगवाड, तजामुल मंसूर, वसीम अहमद वार, सुहैल अशरफ और इश्तियाक अहमद शामिल हैं।

आर-1 किस्म ने दिखाया सबसे बेहतर असर

प्रयोगशाला में पांचों किस्मों को कीट के लार्वा पर आजमाया गया। इनमें आर-1 किस्म सबसे प्रभावी रही। परीक्षण में प्रति लार्वा एक हजार सूक्ष्म कीटों के इस्तेमाल से शुरुआती अवस्था के 50 प्रतिशत लार्वा को मारने में करीब 66 घंटे लगे। मात्रा बढ़ाकर चार हजार करने पर यही असर करीब 26 घंटे में दिखाई दिया।

बड़े लार्वा पर असर अपेक्षाकृत धीमा रहा। यह सूक्ष्म कृमि कीट के शरीर में प्रवेश कर उसके साथ मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया की मदद से उसे मारते हैं। इस प्राकृतिक प्रक्रिया का उपयोग भविष्य में जैविक कीट नियंत्रण के लिए किया जा सकता है।

अब बागान में परीक्षण की बारी

शेरे कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मे विज्ञानी डा संदीप ने कहा कि यह खोज रासायनिक कीटनाशकों के सुरक्षित विकल्प की दिशा में उम्मीद जगाती है, लेकिन अभी इसे किसानों के लिए समाधान नहीं माना जा सकता। अब अलग-अलग क्षेत्रों के सेब बागानों में इसका परीक्षण करना होगा।

साथ ही मौसम और मिट्टी के अनुसार इसकी प्रभावशीलता, बड़े पैमाने पर उत्पादन और भंडारण की संभावनाओं को भी जांचना जरूरी है। यदि खेतों में भी इसके परिणाम सफल रहते हैं, तो कश्मीर की मिट्टी से मिले ये सूक्ष्म कीट सेब उत्पादकों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। इससे रसायनों पर निर्भरता घटाने का रास्ता खुल सकता है।

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