बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को मालाबार हिल के व्यवसायी बिपिन अग्रवाल की 2017 में हुई गिरफ्तारी को अवैध करार दिया। कोर्ट ने पाया कि एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने एक डेवलपर के साथ मिलीभगत करके अग्रवाल को जबरन वसूली के एक मामले में झूठा फंसाया था।
अदालत ने हाई कोर्ट रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह इस फैसले को अपनी प्रशासनिक समिति के सामने रखे, ताकि 64वें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के खिलाफ उचित कार्रवाई की जा सके। इन मजिस्ट्रेट ने बिना कोई कारण दर्ज किए ही अग्रवाल की कस्टडी को मंजूरी दी और उसे जारी रखा।
जस्टिस कमल खाता और ए.एस. गडकरी की पीठ ने अग्रवाल की रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पुलिस ने बिना किसी सबूत के याचिकाकर्ता को गैंगस्टर, हिस्ट्री-शीटर या जबरन वसूली करने वाला बताने की कोशिश की है।
पुलिस रिकॉर्ड में मिली विसंगतियां
हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि नकद भुगतान क्यों किया गया था और न ही इस बात की जांच की कि क्या यह किसी अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) के तहत दिया गया एडवांस भुगतान था।
अदालत को पुलिस रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां मिलीं, जिनमें गिरफ्तारी फॉर्म में ओवरराइटिंग, स्टेशन डायरी में विरोधाभासी प्रविष्टियां, गिरफ्तारी के आधार के बारे में जानकारी का न होना और फोरेंसिक रिपोर्ट को छिपाने का आरोप शामिल है।
अदालत ने माना कि गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड मनमानीपूर्ण और कठोर थी, जिसे बिना ठीक से सोचे-समझे और कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना अंजाम दिया गया था। हाई कोर्ट ने यह भी गौर किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 384 (वसूली/एक्सटॉर्शन) के तहत अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान है, फिर भी पुलिस यह नहीं बता पाई कि उनकी गिरफ्तारी क्यों जरूरी थी।
बेंच ने पाया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 41A के तहत नोटिस गिरफ्तारी के बाद दिया गया था और अग्रवाल को इसका पालन करने का कोई उचित मौका नहीं दिया गया था। अदालत ने माना कि रिमांड जारी रखने की अनुमति देते समय मजिस्ट्रेट ने अपने न्यायिक विवेक का स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल नहीं किया।
‘अग्रवाल को हुआ आर्थिक नुकसान’
माना गया कि गैर-कानूनी गिरफ्तारी के कारण काफी आर्थिक नुकसान हुआ और अग्रवाल की प्रतिष्ठा को ऐसी क्षति पहुंची जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। अदालत ने सेठ एंड सोनल डेवलपर्स द्वारा दायर एक संबंधित आपराधिक आवेदन का भी निपटारा कर दिया, क्योंकि मुख्य याचिका के निपटारे के बाद अब इसका कोई आधार नहीं बचा था।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

