भारतीय रसोई का साथी: रथ वनस्पति घी का दिलचस्प इतिहास, डालडा को हराने के लिए हुई थी शुरुआत; फिर ऐसे खोता गया चमक
भारत में ऐसे कई तेल, देशी घी और वनस्पति घी ब्रांड हैं, जिनका इतिहास बेहद खास है। इनमें से एक है रथ वनस्पति घी (Rath Vanaspati Ghee History)। अगर आप 90 के दशक या उससे पहले पैदा हुए हैं तो आपने इस ब्रांड का घी जरूर देखा होगा। मगर इसकी शुरुआत कैसे, कब और कहां हुई, आइए जानते हैं।
डीसीएम श्रीराम का एक और पुराना घी ब्रांड ‘पनघट’ बाजार में आ चुका था। मगर वो मुख्य रूप से थोक बाजार, हलवाइयों, होटलों और रेस्तरां के लिए 15 किलो के बड़े डिब्बों में आता था। वहीं कंपनी ने रथ वनस्पति घी को विशेष रूप से आम घरों और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए छोटे पैक में लॉन्च किया गया।
डालडा को टक्कर
बाजार में आते ही रथ ने ‘डालडा’ को कड़ी टक्कर दी और भारत के रसोई घरों में अपनी एक खास जगह बनाई। 1937 में आए ‘डालडा’ के बाद 1940 में ‘गगन’ और 1946 में ‘पनघट’ आए। इसके बाद 1950 में रथ ने अपनी देसी और भावनात्मक मार्केटिंग के दम पर बाजार में एक मजबूत पहचान बनाई। रथ वनस्पति आज भी भारत के कई हिस्सों में उपलब्ध है और दशकों से भारतीय रसोई का हिस्सा बना हुआ है।
कब मिला ट्रेडमार्क?
‘रथ’ को 10 अक्टूबर 1984 को चंडीगढ़ में अपना ट्रेडमार्क मिला। मगर 1990 के दशक में DCM समूह का पतन शुरू हो गया। उस समय तक यह ब्रांड DCM परिवार की सिद्धार्थ श्रीराम शाखा के कंट्रोल में था और साल 2000 में उन्होंने ‘रथ’ ब्रांड को ‘कॉनएग्रो फूड्स’ (ConAgro Foods) को 120 करोड़ रुपये में बेच दिया।
सिमटता गया मार्केट
‘रथ’ के TV पर कई दिलचस्प विज्ञापन आते थे, जो 1970 और 80 के दशक में दूरदर्शन पर अक्सर देखने को मिलते थे। साल 2010 में, ‘रथ’ को ‘कारगिल इंडिया’ (Cargill India) को बेच दिया गया। कारगिल ने ओडिशा में ‘जगन्नाथ रथ यात्रा’ को प्रायोजित करके और इसका प्रसारण किया और ‘रथ’ ब्रांड को फिर से बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें इसमें बहुत कम सफलता मिली।
अपनी शुरुआत के 76 साल बाद भी, यह ब्रांड आज भी बाजार में मौजूद है, हालाँकि अब इसका मार्केट काफी सिमट गया है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

