मुख्तार अब्बास नकवी ने बताया जनसंघ से भाजपा का सफर, कहा- निर्दिष्ट तपस्या और निरंतर परिश्रम का परिणाम

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जनादेश में फिसड्डी, जंतर-मंतर पे कबड्डी खेल रही खुड़पैची विरासत, खुराफाती सियासत के “बिना ब्रेक के बवाली”, “बेवकूफी के सवाली” सत्तालोलुप सुल्तानों को जनसंघ से लेकर भाजपा के संघर्ष, संकल्प के साथ निरन्तरता के सियासी सफर को समझने के लिए, अक्टूबर 1951 में एकात्म मानववाद और राष्ट्रवाद की सैद्धांतिक प्रतिबद्धता के साथ अस्तित्व में आये भारतीय जनसंघ की राष्ट्रवादी राजनीतिक विकास, विश्वास यात्रा में समझना होगा।

जनसंघ ,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, एकात्म मानववाद, अखंड भारत, एकात्म राज्य, मजबूत केंद्र, स्वदेशी और विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था के राष्ट्रवादी संकल्प को लेकर बिना रुके-थके, आगे बढ़ने का चुनौतीपूर्ण सफर नाकामियों के रनवे पर कामयाबी का हाइवे रहा।

“वो अकेले ही चले थे जानिबे मंजिल मगर।
लोग साथ आते गए और कारवां बढ़ता गया।।”

जिस दौर में कांग्रेस का देश की राजनीतिक फिजां में एकछत्र जलवा था, दूसरे सियासी दलों की जनादेश में हिस्सेदारी ऊंट के मुंह में जीरा जैसी थी, जनसंघ के राजनीतिक ऊसर में राष्ट्रवादी उपज के जुनून, जज्बे से भरपूर तपस्या की ताकत, परिश्रम के परिणाम ने देश की सियासी जमीन को दीपक की रोशनी से रौशन करने का प्रभावी प्रयास शुरू कर दिया था।

लोकसभा का पहला आम चुनाव 1952 में जनसंघ में 3 लोकसभा सीटें और 3% से अधिक वोट हासिल कर चुनावी मैदान में धमाकेदार एंट्री के साथ नए नवेले जनसंघ ने सफलता के सफर को आगे बढ़ाते हुए, 1957 के दूसरे आम चुनाव में 4 सीटें और 6% वोट, तीसरे लोकसभा चुनाव 1962 में 14 सीटें और 7% वोट, चौथे आम चुनाव 1967 में जनसंघ को 35 लोकसभा सीटें और 10% वोट मिले, 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान जब कांग्रेस की तूती बोल रही थी, तब भी जनसंघ 22 सीटें और 8% वोट हासिल कर अपनी जानदार मौजदूगी दर्ज कराई।

पाकिस्तान के टुकड़े ,बंग्लादेश निमार्ण के साथ लगातार विजय ने कांग्रेस और श्रीमती इंदिरा गांधी के गगन चुम्बी अहंकार,अकड़ को उरूज पर पहुंचा दिया था।

इसी गगन चुम्बी गुरूर,सत्ता के सुरूर के बीच सत्ता के दलालों,लूट लाबी के निरंकुश वर्चस्व के नतीजे में गुजरात का भ्रष्टाचार के विरुद्ध नवनिर्माण आंदोलन, बिहार में छात्र, युवा आंदोलन, देश भर में सामाजिक,आर्थिक, शैक्षणिक सवालों पर बढ़ता जनाक्रोश और उसको दबाने, कुचलने के लिए बर्बरता, जुर्म-ज़ुल्म का इस्तेमाल करती, सत्ता पर जन्मसिद्ध अधिकार समझने वाली कांग्रेस ने, श्रीमती गांधी के रायबरेली चुनाव में भ्रष्ट आचरण को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से झुंझलाकर, 1975 को देश में आंतरिक आपातकाल लगा कर हज़ारों छात्रों-नौजवानों, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक लोगों को 19 महीनों तक जेल के सींखचों में कैद कर दिया।

1977 आपातकाल खत्म होने के साथ सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने जिसमें जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, लोक दल, कांग्रेस संगठन, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी आदि ने लोकतंत्र की बहाली और बेहतरी के लिए अपने दलों का विलय कर जनता पार्टी का गठन किया। 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का उत्तर भारत में सूपड़ा साफ होने के साथ उसकी केंद्रीय सरकार से बिदाई बेदखली हुई।

जनता पार्टी आंतरिक विरोधाभास के चलते टूट गई और फिर से उसमें विलय हुई पार्टियों नें अपने वजूद को जिंदा करने की शुरूआत की, जनसंघ का दोबारा भारतीय जनता पार्टी के रूप में उदय हुआ, 1980 लोकसभा चुनाव में बीजेपी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ी, क्योंकि चुनाव जनवरी 1980 में हुआ और बीजेपी का गठन चुनाव के बाद 6 अप्रैल 1980 में हो पाया था।

उसके बाद हुए 1984 लोकसभा के चुनाव में भाजपा ने 2 सीटें और 8% वोट के साथ चुनावी मैदान में पुनः प्रवेश किया, अन्य राजनैतिक दल भाजपा के राजनैतिक वजूद पर कटाक्ष करते थे, “हम दो हमारे दो” यानी अटल-अडवाणी और उनके दो एम.पी।

तमाम तरह की राजनैतिक असहिष्णुता, सियासी अस्पृश्यता के दुराग्रह पूर्ण दौर को दरकिनार कर, 1989 के आम चुनाव ने देश की राजनैतिक फिजां में बीजेपी के कमल का जलवा काश्मीर से कन्याकुमारी तक महसूस होने लगा और उक्त चुनाव में भाजपा ने 85 लोकसभा सीटें और 12% वोट के साथ धाराप्रवाह धमाकेदार धाक के साथ आगे बढने का सिलसिला शुरू हुए।

1991, आम चुनाव में भाजपा ने 120 सीटें और 20% वोट, 1996 लोकसभा निर्वाचन में 161 सीटें और 21% वोट, 1998 में 182 सीटें और 26% वोट के साथ केन्द्र में अटल जी के नेतृत्व में सरकार बनी, 1999 में 182 सीटें और 24% वोट, पुनः अटल जी की सरकार बनी, 2004 में 138 सीटें और 22% वोट, 2009 में 116 सीटें और 19 % वोट हासिल किए।

2014 चुनाव में 282 सीटें और 32% वोट, के साथ श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सुशासन के सफर का सिलसिला शुरु हुआ, जो 2019 में 303 सीटें और 38% वोट, 2024 में 240 सीटें और 37% वोट के साथ भाजपा का सफल सफर आगे बढ़ रहा है।

जनसंघ या भाजपा ने कभी रिजीम चेंज के नाम पर अस्थिरता, अराजकता, उद्दंडता को ना प्रोत्साहित किया ना प्रायोजित। जनादेश के सबक-संदेश को स्वीकार कर सिर माथे पर लेते हुए, अपने जनाधार को मजबूत करने और संगठन के विस्तार में जुटे रहे। जिसका नतीजा है आज भाजपा का दुनिया के सबसे बड़े राजनैतिक दल के रूप में स्थापित होना,और भारत के 78% आबादी पर भाजपा और सहयोगी दलों की सरकारें।

कांग्रेस, चौधरी चरण सिंह, देवगौड़ा, गुजराल, चन्द्रशेखर, मोरारजी देसाई आदि गैर-कांग्रेस सरकारों के तख्तापलट की हिस्ट्रीशीटर है, लेकिन इस बार उसका और उसके तख्तापलट के राष्ट्रीय, बहुराष्ट्रीय निवेशकों का गणित गच्चा खा गया है, भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बिना कांग्रेस के रहम-रिमोट के भारत की धाक-धमक को धारदार बनाती हुआ, उसे धूमिल करने की धूर्ततापूर्ण धुन को धूलधूसरित करती निरंतरता के साथ आगे बढ़ रही है।

चुनावी चक्रवात में चारो खाने चित चंडाल चौकड़ी, की धाराप्रवाह धूर्ततापूर्ण धुन राफेल के झूठ और रिजीम चेंज के झांसे का झक्की झुंड और रंग बिरंगे रणछोड़ बहादुरों के रंगमंच की खटिया खड़ी, बिस्तरा गोल हो रहा है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में सरकारें “बैलट की ताकत” से बनती-बदलती हैं, “बुलेट-बवाल की आफत” से नहीं। देश में 1977 की आपातकाल की बर्बरता के दौर सहित, 18 आम चुनाव और सैकड़ों विधान सभा, पंचायत, स्थानीय निकाय चुनाव हुए, जनता ने बैलट को जनादेश का हथियार बनाया, बुलेट-बवाल को नहीं। आज भी यही जनतंत्र का जुनून, जनादेश का जज्बा कायम है।

जनतंत्र की कनपटी पर बंदूक रखकर, जनादेश की लिंचिंग में लगी लम्पट लाबी की सनक का लगातार, बारम्बार सूपड़ा साफ होरहा है। जनादेश की शक्ति को जंतर-मंतर की शरारत, से बदनाम, बंधक, डिस्टर्ब, डिफेम, डीस्टेबलाईज करने की साजिश छूमंतर होगी।

बाहरी घमासान और अंदरूनी व्यवधान के संकट-कंटक के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तपस्या की ताकत और परिश्रम के परिणाम ने भारत और मोदी जी को “ग्राऊंड जीरो का ग्लोबल हीरो” बनाया है।

सियासी असहिष्णुता, सामन्ती अस्पृश्यता के बीच, श्री नरेंद्र मोदी के 25 वर्षीय गुजरात से दिल्ली तक के सुशासन सफर की सफलता सत्तालोलुप सुल्तानों की आंख की किरकिरी बना हुआ है, इसी हार की हिस्टीरिया, डिफीट के डिप्रेशन में बिना ब्रेक का बवाल, बेवकूफी के सवाल में डायनेस्टी के डिफॉल्टर डपोरशंख डटे है, दुनिया की सबसे बड़े लोकतंत्र को डायनेस्टी का डिज्नीलैन्ड नहीं बन्ने दिया जा सकता,अराजकता की आफत से जनतंत्र की ताकत को बंधक नहीं किया जा सकता।

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