परिसीमन के मुद्दे पर भाजपा की नई राजनीतिक चाल ने विपक्षी खेमे में हलचल बढ़ा दी है। कांग्रेस को आशंका है कि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए विपक्षी खेमे में सेंध लगाने और रणनीति बनाने में जुटी है।
सरकार ने इस साल अप्रैल में लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने की कोशिश की थी, लेकिन असफल रही। अप्रैल में महिला आरक्षण और लोकसभा सीटें 850 करने वाला संविधान संशोधन विधेयक दो-तिहाई बहुमत न मिलने से अटक गया था
इसके बाद विधेयक के पक्ष में 298 वोट और विपक्ष में 230 वोट पड़े। इसके लिए उपस्थित और मतदान करने वाले 528 सदस्यों में से कम से कम 352 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता थी। हालांकि अभी तक सत्रावसान नहीं हुआ है।
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अब कांग्रेस को इस बात का डर है कि सरकार बहुमत जुटाकर इस विधेयक को दोबारा पारित कराने की तैयारी में है और दो-तिहाई बहुमत हासिल करने और दोनों विधेयकों को पारित कराने के लिए विपक्षी खेमे की अन्य पार्टियों के साथ पर्दे के पीछे साजिशें रच रही है।
पीएम मोदी को लिखे अपने पत्र में खरगे ने याद दिलाया कि उन्होंने सबसे पहले 11 अप्रैल, 2026 को सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की थी, जिसे नजरअंदाज कर 14 अप्रैल की देर शाम विधेयक सार्वजनिक किए गए और 16 अप्रैल को विशेष सत्र बुलाया गया।
हालांकि, 17 अप्रैल को यह संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका था। खरगे ने कहा कि इसके बाद उन्होंने 16 जुलाई और 27 अगस्त को भी पत्र लिखे थे और अब चौथी बार सरकार से एकतरफा कदम रोकने और सभी दलों से परामर्श करने की अपील कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि इस प्रस्तावित कानून पर सपा, डीएमके, वाईएसआरसीपी, एनसीपी (एसपी), शिवसेना (यूबीटी), एआईएमआईएम और बीजद समेत कई प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श किया गया है। इसके साथ ही, रिजिजू ने मानसून सत्र के सत्रावसान में हो रही देरी को लेकर खरगे की चिंताओं को पूरी तरह खारिज कर दिया।
पुराने उदाहरणों का हवाला देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान में ऐसा कोई नियम नहीं है जो अनिश्चितकाल के लिए स्थगित सदन को एक तय समयसीमा के भीतर सत्रावसान करने को अनिवार्य बनाता हो। उन्होंने कहा कि केवल सत्रावसान न होने से कोई संवैधानिक या प्रक्रियात्मक अनियमितता पैदा नहीं होती है।
चूंकि परिसीमन एक संविधान संशोधन विधेयक है जिसे अध्यादेश से नहीं लाया जा सकता, इसलिए बिना सत्रावसान के यह विकल्प खुला रखा गया है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार अभी भी बहुमत जुटाने के प्रयास में है और यहीं से विपक्ष की एकता का दूसरा सवाल उठता है।
लेकिन डीएमके ने मिले-जुले संकेत दिए हैं- एक तरफ तो वह नीट विरोधी आंदोलन का समर्थन कर रही है, वहीं दूसरी तरफ तमिलनाडु में विजय और टीवीके सरकार को समर्थन देने के लिए कांग्रेस पर दोहरे रवैये का आरोप भी लगा रही है। इसके अलावा कुछ ऐसे दल भी हैं जो दोनों पक्षों में रहे हैं, जैसे शिवसेना (यूबीटी) और टीएमसी।
हालांकि, परिसीमन विधेयक पर सरकार की सीधी बातचीत ने विपक्षी खेमे में दुविधा पैदा कर दी है, जिससे एसआईआर पर बनी इस एकजुटता के बिखरने की आशंका बढ़ गई है।
एसआईआर (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ बीजेडी समेत कई क्षेत्रीय दल और नागरिक समाज समूह एकजुट हैं। हालांकि, परिसीमन विधेयक पर इन दलों की सरकार के साथ अलग से हो रही बातचीत ने कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है, जिससे इस संयुक्त विरोध के बीच विपक्षी एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए हैं
इसके साथ ही, महिला आरक्षण विधेयक विपक्षी दलों के लिए दोधारी तलवार साबित हो रहा है। इसका विरोध करने पर भाजपा उन्हें महिला-विरोधी ठहराने का मौका पा जाती है, जबकि समर्थन करने पर क्षेत्रीय दलों को पुरुष नेताओं के राजनीतिक समीकरण बिगाड़े बिना महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का सीधा लाभ मिलता है। यानी बीजेपी की यह परिसीमन चाल कहीं ना कहीं विपक्षी की एकता में सेंध लगाकर उनमें मतभेद डाल सकती है।
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विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

