शहरों में सीवरेज के पानी को कचरा समझकर नष्ट करने के बजाय उसका उपचार कर दोबारा इस्तेमाल करने की दिशा में कई नगर निकाय काम कर रहे हैं। गुजरात का सूरत मॉडल इस मामले में चर्चा में है। यहां सीवेज से निकलने वाले पानी को आधुनिक तकनीक से ट्रीट कर औद्योगिक इस्तेमाल के लिए बेचा जा रहा है। इससे नगर निगम को करोड़ों रुपये का राजस्व भी मिल रहा है। वहीं, चंडीगढ़ में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाली दुर्गंध को नियंत्रित करना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है।
सूरत में सीवेज से तैयार हो रहा उपयोगी पानी
सूरत में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए गंदे पानी को कई चरणों में साफ किया जाता है। उपचारित पानी की गुणवत्ता को निर्धारित मानकों के अनुरूप लाने के बाद इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से औद्योगिक जरूरतों के लिए किया जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, सूरत नगर निगम उपचारित पानी को उद्योगों को बेचता है। इससे पानी की मांग का दबाव कम करने के साथ-साथ निगम के लिए राजस्व का स्रोत भी तैयार हुआ है। (timesofindia.indiatimes.com)
पानी की बिक्री से निगम को करोड़ों की कमाई
सीवेज के उपचार और पुन: उपयोग से सूरत नगर निगम को आर्थिक फायदा भी हो रहा है। उपचारित पानी की बिक्री से हर साल करोड़ों रुपये का राजस्व जुटाने की व्यवस्था विकसित की गई है।
इस मॉडल का एक फायदा यह है कि उद्योगों के लिए वैकल्पिक जल स्रोत उपलब्ध होता है और ताजे पानी पर निर्भरता घटाई जा सकती है। इससे शहर के जल संसाधनों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।
क्या यह पानी पीने योग्य है?
सीवेज से निकले पानी को कई स्तरों पर उपचारित करने के बाद उसकी गुणवत्ता काफी बेहतर की जा सकती है। हालांकि सूरत में जिस पानी की बिक्री की बात सामने आती है, उसका प्रमुख उपयोग औद्योगिक जरूरतों के लिए है।
इसलिए “सीवेज का पानी पीने लायक” कहने के बजाय इसे उच्च स्तर पर उपचारित और पुन: उपयोग योग्य पानी के रूप में समझना ज्यादा उचित है। किसी भी पानी को पेयजल के रूप में इस्तेमाल करने के लिए संबंधित स्वास्थ्य और जल गुणवत्ता मानकों का पालन जरूरी होता है।
चंडीगढ़ में बदबू से निपटना चुनौती
दूसरी ओर, चंडीगढ़ में सीवेज ट्रीटमेंट से जुड़ी एक अलग समस्या सामने आती है। कई इलाकों में ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाली दुर्गंध लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती रही है।
सीवेज में मौजूद कार्बनिक पदार्थों के विघटन के दौरान दुर्गंध पैदा करने वाली गैसें बन सकती हैं। ऐसे में प्लांट की तकनीक, संचालन, रखरखाव और आसपास के क्षेत्र में गंध नियंत्रण की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
शहरों के लिए बढ़ती जरूरत
तेजी से बढ़ती आबादी और पानी की मांग के बीच सीवेज के उपचार और पुन: उपयोग को भविष्य की जल प्रबंधन रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। सूरत जैसे शहरों में उपचारित पानी की बिक्री से जहां जल संरक्षण के साथ राजस्व का मॉडल तैयार होता है, वहीं चंडीगढ़ जैसे शहरों के सामने ट्रीटमेंट के बाद पर्यावरणीय और स्थानीय शिकायतों को दूर करने की चुनौती है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

