झारखंड में स्लीपर बसों के संचालन और उनकी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हाल के बस हादसों और दूसरे राज्यों में सामने आई घटनाओं के बाद इन बसों की फिटनेस, बॉडी में किए गए बदलाव, परमिट और निगरानी व्यवस्था पर फिर से चर्चा तेज हो गई है। उपलब्ध रिपोर्टों में नियमों के उल्लंघन और जांच व्यवस्था में खामियों के आरोप सामने आए हैं।
मानकों से अलग बसों के संचालन का आरोप
रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में कुछ स्लीपर बसों में निर्धारित मानकों से अधिक सीटें और स्लीपर बनाए जाने के मामले सामने आए हैं। कुछ बसों की बॉडी में भी निर्धारित मानकों से अलग बदलाव किए जाने की बात कही गई है। ऐसे बदलाव बस की संरचना और यात्रियों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।
स्लीपर बसों के लिए निर्धारित बॉडी और सीटिंग मानकों के मुताबिक पंजीकरण और भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। ऐसे में सवाल यह है कि यदि मानकों से अलग बदलाव वाली बसें सड़क पर चल रही हैं, तो फिटनेस जांच के दौरान इन्हें कैसे मंजूरी मिल रही है।
यात्रियों की सुरक्षा के सामने कई चुनौतियां
स्लीपर बसों में ओवरलोडिंग, क्षमता से अधिक सीटें और अन्य नियमों के उल्लंघन की शिकायतें भी सामने आती रही हैं। कुछ रिपोर्टों में बसों में यात्रियों के साथ सामान ढोने की बात भी सामने आई है, जिससे वाहन के संतुलन और संचालन पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है।
बसों में आग लगने की घटनाएं भी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ाती रही हैं। झारखंड में पहले भी चलती बसों में आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। 2024 में झारखंड से अयोध्या जा रही एक टूरिस्ट बस में वाराणसी के पास आग लगने की घटना हुई थी, हालांकि तत्काल कार्रवाई से यात्रियों को बाहर निकाला गया।
फिटनेस जांच और निगरानी व्यवस्था पर सवाल
सुरक्षा व्यवस्था का एक अहम हिस्सा नियमित फिटनेस जांच और सड़क पर प्रवर्तन कार्रवाई है। दूसरे राज्यों में हालिया जांच अभियानों के दौरान भी स्लीपर बसों में मानक से अधिक बॉडी, अतिरिक्त सीटें, बिना परमिट संचालन और ओवरलोडिंग जैसी कमियां सामने आई हैं। वाराणसी में मई से जुलाई 2026 के बीच परिवहन विभाग ने 12 स्लीपर बसों को सीज किया और 55 के चालान किए।
झारखंड में भी बसों की नियमित जांच, फिटनेस प्रमाणपत्र, परमिट और अग्निशमन उपकरणों की स्थिति की निगरानी को प्रभावी बनाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। यात्रियों की सुरक्षा केवल कागजी फिटनेस तक सीमित न रहकर वास्तविक स्थिति की जांच से जुड़ी है।
हादसों के बाद बढ़ी सुरक्षा की चिंता
देश के अलग-अलग हिस्सों में स्लीपर बसों से जुड़े हादसों ने लंबी दूरी की बस यात्रा की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है। जमशेदपुर में भी सभी बसों के सेफ्टी ऑडिट की मांग उठ चुकी है।
ऐसे में झारखंड में स्लीपर बसों की सुरक्षा के लिए नियमित और प्रभावी फिटनेस जांच, मानकों के अनुरूप बॉडी व सीटिंग, परमिट की जांच, अग्निशमन उपकरणों की उपलब्धता और सड़क पर निरंतर निगरानी अहम मानी जा रही है। इन व्यवस्थाओं के प्रभावी होने से नियमों के उल्लंघन और यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को कम करने में मदद मिल सकती है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

