छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल रिश्वत के रूप में इस्तेमाल किए गए नोटों की बरामदगी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है, जब तक कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग को बिना किसी संदेह के साबित न कर दे।
इसके साथ ही रिश्वत की मांग साबित करने के लिए पेश किए गए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में भी गंभीर खामियां पाई गईं। उच्च न्यायालय ने सूरजपुर की विशेष अदालत के मार्च 2017 के फैसले को रद करते हुए लेखापाल को रिश्वतखोरी के सभी आरोपों से बरी कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, मां सरस्वती शिक्षा समिति द्वारा संचालित एक स्कूल की मान्यता के एवज में लेखापाल ने समिति के अध्यक्ष से 15,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। बाद में यह कथित मांग घटाकर 8,000 रुपये तय हुई।
एंटी करप्शन ब्यूरो में शिकायत दर्ज होने के बाद 30 जून 2014 को सूरजपुर स्थित डीईओ कार्यालय में जाल बिछाया गया था। अभियोजन का दावा था कि आरोपी ने 8,000 रुपये के नोट स्वीकार किए और उन्हें रंगे हाथों पकड़ा गया। नोट उसकी जेब से बरामद हुए थे और केमिकल जांच में भी नोटों को छूने की पुष्टि हुई थी।
मुकदमे की ट्रायल के दौरान मामले में बड़ा मोड़ आया। खुद शिकायतकर्ता ने बयान दिया कि लेखापाल ने उससे कभी रिश्वत की मांग नहीं की थी। वहीं, एक अन्य गवाह ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता ने जबरन लेखापाल की जेब में पैसे डाल दिए थे। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि किसी भी गवाह ने रिश्वत मांगने के मुख्य आरोप का समर्थन नहीं किया।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों में भी भारी लापरवाही
उच्च न्यायालय ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी ने स्वीकार किया था कि ऑडियो रिकॉर्डिंग के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाण पत्र नहीं लिया गया था।
इसके अलावा, आरोपी की आवाज का कोई सैंपल भी नहीं लिया गया था और न ही रिकॉर्डिंग की आवाज की पुष्टि के लिए कोई फॉरेंसिक जांच कराई गई थी। इन सभी खामियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी को राहत प्रदान की।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

