देश में डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इंडियन जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरनमेंटल मेडिसिन की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल में देश के 60.9% डॉक्टरों ने अपने कार्यस्थल (अस्पताल) पर हिंसा का सामना किया है।
सबसे हैरानी की बात यह है कि डर या कार्रवाई न होने की आशंका के कारण 48% डॉक्टरों ने ऐसी घटनाओं की शिकायत अधिकारियों से की ही नहीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, हिंसा की मुख्य वजह इलाज से नाराजगी और कहासुनी रही, जबकि सबसे ज्यादा हमले ओटी (OT) और आईसीयू (ICU) जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में दर्ज किए गए।
सरकारी डॉक्टरों में से 63.5% और निजी डॉक्टरों में से 56.9% ने हिंसा झेली। पुरुष 64.7%, महिलाएं 52.9% शिकार रहीं।
ओटी और आईसीयू में सबसे ज्यादा हमले
- ओटी (OT)- 88.8%
- आईसीयू (ICU)- 85.3%
- इमरजेंसी- 68.6%
- वार्ड- 46.6%
- ओपीडी (OPD)- 42.6%
(नोट- इनमें से दो-तिहाई हमले रात के समय होते हैं।)
तीन साल में सौ हमले, आधे 6 राज्यों में – स्टडी
- महाराष्ट्र- 15 मामले
- केरलम- 9 मामले
- पंजाब- 8 मामले
- दिल्ली- 7 मामले
- कर्नाटक- 6 मामले
- उत्तर प्रदेश- 6 मामले
2019 में डॉक्टरों की सुरक्षा से संबंधित एक मसौदा (ड्राफ्ट) जारी किया गया था, जिसमें गंभीर चोट पहुंचाने पर 10 साल तक की जेल और 10 लाख रुपये के जुर्माने का कड़ा प्रस्ताव था, लेकिन 2023 में केंद्र सरकार ने इसके लिए अलग से केंद्रीय कानून बनाने से इनकार कर दिया।
केंद्र सरकार ने 2025 में लोकसभा में स्पष्ट किया था कि डॉक्टरों के खिलाफ होने वाली हिंसा का कोई अलग राष्ट्रीय डेटा नहीं रखा जाता है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

