हवा में पक्षियों की तरह आकार बदलेंगे विमान के पंख, क्रैश होने से बचाएगी IIT मद्रास की ‘मार्फिंग स्किन’ तकनीक

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आसमान में बेखौफ गोते लगाते परिंदों को देखकर बरबस यह सवाल मन में आता है कि क्या हमारे विमान भी पक्षियों की तरह हवा के थपेड़ों के बीच खुद को ढाल सकते हैं? इसी मौलिक जिज्ञासा और विज्ञान के बेजोड़ तालमेल से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी मद्रास के विज्ञानियों ने एक ऐसी क्रांति को जन्म दिया है, जो आने वाले समय में विमान यात्रा की तस्वीर पूरी तरह बदल कर रख देगी।

पक्षियों की उड़ान से प्रेरित होकर विकसित की गई यह ‘मार्फिंग स्किन’ तकनीक विमानन जगत की सबसे बड़ी और खतरनाक चुनौतियों में से एक ‘एयरोडायनेमिक स्टाल’ यानी हवा के रुख में अचानक तब्दीली अचानक और विमान के असंतुलित होने के खतरे से प्रभावी ढंग से निपटेगी।

एयरोडायनेमिक स्टाल वह गंभीर स्थिति है जब विमान के पंखों से हवा का प्रवाह (एयरफ्लो) अलग हो जाता है, जिससे लिफ्ट यानी ऊपर उठाने वाली ताकत अचानक समाप्त हो जाती है और ड्रैग यानी हवा का प्रतिरोध बढ़ जाता है। ऐसे में विमान अपना संतुलन खोकर नीचे की ओर गिरने लगता है।

इस जानलेवा समस्या का समाधान निकालते हुए आईआईटी मद्रास के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रिंकू मुखर्जी के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक प्रतिभावान टीम ने एक ऐसा लचीला बाहरी विंग असेंबली अटैचमेंट (‘मार्फिंग स्किन’) तैयार किया है, जो वास्तविक समय में खुद को हवा के रुख के अनुसार बदल लेता है।

इस शोध के तकनीकी पहलुओं पर रोशनी डालते हुए डॉ. रिंकू मुखर्जी बताती हैं, “हमारा यह शोध इस बात पर आधारित है कि पक्षी कभी ‘स्टॉल’ का शिकार क्यों नहीं होते, जबकि विमान, जो उन्हीं से प्रेरित होकर बनाए गए हैं, आज भी इस खतरे से जूझते हैं।”

इस टीम ने मैक्रो फाइबर कंपोजिट (एमएफसी) पट्टियों का उपयोग करके प्रकृति की इसी अनुकूलन क्षमता को इंजीनियरिंग में साकार किया है, जो वास्तविक समय में आकार बदलने की क्षमता रखती हैं। इस शोध में डॉ. मुखर्जी के साथ संस्थान के पूर्व छात्र एंथनी सैमुअल बी ने न्यूमेरिकल कोडिंग में और डॉ. अरित्रस राय ने विंड टनल (सुरंग) के प्रयोगों में अहम भूमिका निभाई है।

प्रतिष्ठित पत्रिका ‘यूरोपियन जर्नल ऑफ मैकेनिक्स – बी/फ्लुइड्स’ में प्रकाशित इस अध्ययन के निष्कर्षों ने दुनिया भर के विज्ञानियों का ध्यान आकर्षित किया है।

इस तकनीक के व्यावहारिक लाभ बेहद दूरगामी और प्रभावी हैं। उड़ान के दौरान जब विमान सुरक्षित सीमा से अधिक कोण पर झुकते हैं या किसी प्रतिकूल परिस्थिति जैसे टर्बुलेंस का सामना करते हैं, तब यह मार्फिंग स्किन (रूपांतरित होने वाली बाहरी परत) स्वतः सक्रिय होकर विमान को सुरक्षित रखती है और दुर्घटनाओं से बचाती है।

इससे कमर्शियल उड़ानों के लिए छोटे और व्यस्त रनवे पर टेक-ऑफ और लैंडिंग करना और भी सुरक्षित हो जाएगा। इसके अलावा, यह प्रणाली लिफ्ट को बढ़ाकर और ड्रैग को कम करके ईंधन की भारी बचत करती है, जिससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी और विमानन उद्योग हरित ऊर्जा के लक्ष्यों की ओर तेजी से आगे बढ़ेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक का दायरा केवल बड़े यात्री विमानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ड्रोन, मानवरहित हवाई वाहनों (यूएवी), और रक्षा क्षेत्र के विमानों के लिए भी वरदान साबित होगी। सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके लिए पूरे विमान के पंखों को दोबारा डिजाइन करने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे मौजूदा विमानों में भी आसानी से फिट (रेट्रोफिट) किया जा सकता है।

लगभग 20 साल के कड़े परिश्रम और पेटेंट प्रक्रिया से गुजरने के बाद यह तकनीक अब वास्तविक उड़ानों में उपयोग के लिए पूरी तरह तैयार है। यह आविष्कार महज एक वैज्ञानिक सफलता नहीं, बल्कि आसमान में इंसानी सफर को और अधिक सुरक्षित, सहज और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

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