किसी भाषा की प्रतिष्ठा तब उत्कर्ष पर पहुंचती है, जब उसके शब्दों को संसार तक पहुंचाने के लिए अनुवाद की बैसाखी की आवश्यकता नहीं होती। राष्ट्र अपनी उपलब्धियों को अपने शब्द देता है और संसार उन्हीं शब्दों में उन्हें पहचानने लगता है।
भारत की रक्षा और वैज्ञानिक शब्दावली में हिन्दी की धाक
आज भारत की रक्षा और वैज्ञानिक शब्दावली पर दृष्टि डालें तो हिंदी का समृद्ध शब्द-संसार दिखाई देता है- ‘अग्नि’, ‘आकाश’, ‘अस्त्र’, ‘तेजस’, ‘ध्रुव’, ‘नेत्र’, ‘रुद्रम’, ‘प्रहार’, ‘प्रलय’, ‘शौर्य’, ‘वरुणास्त्र’, ‘अरिहंत’, ‘ब्रह्मोस’, ‘विक्रम’, ‘प्रज्ञान’ इत्यादि। इसी तरह, सैन्य अभियानों में ‘विजय’, ‘पवन’, ‘रक्षक’, ‘मेघदूत’, ‘सफेद सागर’, ‘सिंदूर’ जैसे नाम हैं।
ये शब्द बताते हैं कि हिंदी की शक्ति साहित्य सर्जना के साथ-साथ आधुनिक भारत की शक्ति, विज्ञान, संकल्प व स्वाभिमान को भी अभिव्यक्ति देती है।
शब्दों का नया अर्थाकाश
‘अग्नि’, ‘पृथ्वी’ और ‘आकाश’ भारतीय भाषिक-चेतना के अत्यंत प्राचीन शब्द हैं। वैदिक ऋचाओं की ‘अग्नि’ आज आधुनिक प्रक्षेपास्त्र-शृंखला की पहचान है। देश की सामरिक प्रक्षेपास्त्र-शृंखला का नाम जब ‘पृथ्वी’ रखा जाता है; तब इसका आधार इसमें निहित ‘पृथ्’ धातु को बनाया जाता है, जिसका अर्थ– ‘विस्तार’ अथवा फैलाव होता है। वस्तुतः, भारतीय रक्षा-परिरक्षा परिदृश्य को ध्यान से देखें, तो भाषायी अस्मिताबोध से संपृक्त एक अनवरत शृंखला दिखाई देती है।
भाषा का अर्थ विस्तार
हम देखते हैं कि अनंत नभ का ‘आकाश’ आधुनिक सतह-से-वायु प्रक्षेपास्त्र प्रणाली से जुड़ चुका है, जिसमें ‘काश्’ का मूल अर्थ ‘चमकना’ भी शामिल है। यहां भाषा की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया दिखाई देती है-अर्थ-विस्तार। इसके अंतर्गत कोई शब्द अपनी मूल स्मृति खोए बिना नए युग का अर्थ ग्रहण करता है।
भारतीय परंपरा में अस्त्र और शस्त्र के प्रयोग में सूक्ष्म अंतर मिलता है। ‘शस्त्र’ हाथ में धारण कर प्रयुक्त किए जाने वाले आयुध के लिए अधिक रूढ हुआ, जबकि ‘अस्त्र’ में छोड़ने अथवा प्रक्षेपित करने का भाव प्रमुख रहा। इस प्रकार, आधुनिक वायु-से-वायु प्रक्षेपास्त्र का नाम अस्त्र होना भाषिक-दृष्टि से भी सार्थक है। इसी कड़ी में ‘प्रहार’, ‘प्रलय’, ‘शौर्य’ और ‘रुद्रम’ इत्यादि शब्द हैं; जिन्हें सुनते ही क्रमशः ‘आघात’, ‘व्यापक विनाश’, ‘वीरता’ और ‘प्रचंडता’ के अर्थ जाग्रत होते हैं। नाम यहां किसी शब्द का परिचय-पट्ट नहीं; वरन् उसके स्वभाव का भाषिक-संकेत बन जाता है।
समर्थ भाषा का सहज रूप
भारत के स्वदेशी लड़ाकू विमान के नाम में ही उसकी प्रकृति का बिंब उपस्थित है। ‘तेजस’ संस्कृत ‘तेजस्’ से है- दीप्ति, ऊर्जा, ओज, प्रभाव और सामर्थ्य। ‘ध्रुव’ के मूल में ‘ध्रु’ है, जो स्थिर होने, दृढ़ होने का अर्थ देता है। भारतीय स्मृति में ध्रुवतारा अटलता और दिशा का प्रतीक है; आकाश से जुड़ा वही प्राचीन शब्द आधुनिक हेलीकाप्टर को पहचान देता है।
‘नेत्र’– हवाई जगत् में पूर्व-चेतावनी एवं नियंत्रण प्रणाली के लिए ऐसा नाम, जिसे सुनते ही उसका पूरा कार्य-व्यापार समझ में आ जाए। विचारणीय है कि आधुनिकता के लिए दुरूह शब्दावली अनिवार्य नहीं। समर्थ भाषा जटिलतम प्रौद्योगिकी को भी सहज और अर्थवान् नाम दे सकती है। उदाहरण के लिए- रोहिणी, अश्लेषा और भरणी भारतीय नक्षत्र-परंपरा के नाम हैं। आधुनिक भारत में यही नाम रडार प्रणालियों से भी जुड़े हैं। इसमें एक विलक्षण सांस्कृतिक-नैरंतर्य दिखता है।
नामों का बदलता स्वरूप
कभी मनुष्य ने जिन नामों से आकाश को पहचाना था, आज उन्हीं नामों से आकाश पर दृष्टि रखने वाली तकनीक पहचानी जाती है। इसी प्रकार पनडुब्बी-रोधी भारी टारपीडो ‘वरुणास्त्र’ में ‘वरुण’ और ‘अस्त्र’ का संयोग अपने अर्थ का उद्घाटन स्वयं करता है। भारतीय परंपरा में वरुण का संबंध जल से है; अतः समुद्री आयुध के लिए यह नाम भाषिक-दृष्टि से सहज अर्थवान है।
स्वदेशी परमाणु-चालित सामरिक पनडुब्बी ‘अरिहंत’ की संरचना और भी अर्थगर्भित है-‘अरि’ अर्थात् शत्रु और ‘हन्’ अर्थात नष्ट करना। भारतीय दार्शनिक परंपरा में यह शब्द अंतःशत्रुओं पर विजय के आध्यात्मिक अर्थ से भी युक्त है। यह सुखद है कि आज सामरिक क्षेत्र में वही शब्द एक नया अर्थ-क्षितिज प्राप्त करता है।
पराक्रम का भाषिक अध्याय
सैन्य अभियानों में ‘विजय’, ‘पवन’, ‘रक्षक’, ‘मेघदूत’ और ‘सफेद सागर’ जैसे नाम भारतीय भाषा की अलग छटा सामने रखते हैं। ‘सफेद सागर’ बर्फ से ढंके कारगिल क्षेत्र में भारतीय वायु सेना के अतुलनीय साहस से भरा अभियान था तो वहीं जब पहलगाम के आतंकी हमले में परिवार उजड़े और महिलाओं के सुहाग छिने, उसके बाद आतंक के विरुद्ध भारतीय सैन्य कार्रवाई को ‘आपरेशन सिंदूर’ नाम मिला।
इस परिचित शब्द में निजी वेदना, सामाजिक संवेदना और राष्ट्रीय प्रत्युत्तर एक साथ ध्वनित हुए। इस नाम का अर्थ देश को समझाना नहीं पड़ा। यही सांस्कृतिक शब्द की शक्ति है। कोश उसका अर्थ कुछ पंक्तियों में बता सकता है, किंतु समाज उसमें सदियों का अनुभव संचित करता है।
शब्दों की प्रौद्योगिकी पहचान में बड़ी भूमिका
विचारणीय है कि नामकरण भी सांस्कृतिक संप्रभुता है। मनुष्य जिसे खोजता, रचता या निर्मित करता है, उसे अपनी भाषा में पहचान भी देता है। राष्ट्रों के संदर्भ में यह प्रक्रिया और गहरा अर्थ ग्रहण करती है। अपनी अत्याधुनिक वैज्ञानिक और सामरिक उपलब्धियों के नाम अपनी भाषिक-सांस्कृतिक निधि से चुनना सभ्यतागत आत्मविश्वास का सूचक है। प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भर राष्ट्र जब अपनी उपलब्धियों के नाम भी स्वयं गढ़ता है, तो वह केवल वस्तु का निर्माण नहीं करता; उसके बारे में संसार किस शब्द से बात करेगा, यह भी तय करता है!
कम अक्षरों में व्यापक आशय
‘चंद्रयान’ की रचना अत्यंत सहज है-चंद्र + यान। ‘यान’ संस्कृत की ‘या’ धातु से निष्पन्न है, जिसका मूल भाव है- जाना, गति करना। इस प्रकार नाम स्वयं अपना अर्थ खोल देता है- चंद्र की ओर जाने वाला यान। चंद्रयान-3 के अवतरण-यान (लैंडर) ‘विक्रम’ और विचरण-यान (रोवर) ‘प्रज्ञान’ के नाम भी उतने ही अर्थवान् हैं। ‘विक्रम’ के मूल में ‘क्रम्’ है, जिसका अर्थ है– पग बढ़ाना, आगे जाना।
इस प्रकार विक्रम का अर्थ है– विशेष रूप से कदम बढ़ाना, शौर्य, पराक्रम, इत्यादि। ‘प्रज्ञान’ में विशेष ज्ञान अर्थात् विशेष रूप से जानने का भाव है। वैज्ञानिक अभियान के तीन चरण मानो तीन शब्दों में सिमट गए-यात्रा, अग्रगमन और ज्ञान। यही हमारी शब्द-परंपरा का सामर्थ्य है- कम अक्षरों में व्यापक आशय।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

