पान सिंह तोमर के बाद तिग्मांशु धूलिया ने फिल्म घमासान का निर्देशन किया है। फिल्म में अरशद वारसी डकैत की भूमिका में हैं। कई फेस्टिवल में प्रदर्शित हो चुकी यह फिल्म को 11 सितंबर से जी5 पर आएगी। फिल्म में अरशद वारसी डाकू की भूमिका में हैं। फिल्म को लेकर तिग्मांशु और अरशद वारसी ने की खास बातचीत:
बैंडिट क्वीन के समय आप सीख रहे थे। फिर पान सिंह तोमर बनाई, अब घमासान। तीनों डकैत की कहानी रही। क्या चीजें घमासान में मददगार साबित हुई?
तिग्मांशु – डाकू पुलिस वाले के कपड़े पहनते थे, ताकि लोगों को लगे कि टुकड़ी जा रही है, उनके खाने-पीने के सप्लायर्स होते थे। ये सब तो कमन था। बैंडिट क्वीन और पान सिंह दोनों बायोपिक थी। इस फिल्म को बनाना कठिन था, क्योंकि यह बायोपिक नहीं है, अलग-अलग इवेंट से प्रेरित है। इसको एंगेजिंग बनाना, था, इसलिए बच्चों का ट्रैक डाला है, क्योंकि ये सच रिसर्च से ही निकला कि डाकू गांव में आकर रुकते थे और फिर उनके नाजायज बच्चे होते थे। इसलिए इसकी कहानी अलग है।
अरशद वारसी को डाकू के किरदार में कैसे सोचा?
तिग्मांशु : मैंने बहुत शरमा के सोचा था। मतलब मैं जाहिर नहीं कर पाया था किसी को।
अरशद- कहीं ये फिल्म कामेडी ना हो जाए।
तिग्मांशू : मैंने अपने असिस्टेंट को बुलाया उनसे कहा कि एक नाम दे रहा हूं अरशद साहब का, कल सोचकर बताना कि रोल के ले सही है या नहीं। दूसरे दिन सबने सर्वसम्मति से इनका नाम लिया दरअसल मैंने इनकी मुन्नाभाई एमबीबीएस छोड़कर कोई कामेडी फिल्में नहीं देखी है। मैंने इनकी सेहर, डेढ़ इश्किया जैसी फिल्में देखी थी। मेरे अंदर कोई शंका नहीं थी कि किसी कामेडियन को चुन रहा हूं।
अरशद : तिग्मांशू बेहतरीन फिल्ममेकर हैं। ऐसा किरदार मिलना वरदान की बात होती है। अब पान सिंह तोमर फिल्म इरफान की जिंदगी में भी तो आई ही थी। हम सब की जिंदगी में एक ही शोले फिल्म है। वैसे ही यह फिल्म मेरे पास आई है।
अरशद आपको इसके लिए वजन भी बढ़ाना पड़ा होगा? कितने प्रोजेक्ट इस कारण छोड़ने पड़े?
अरशद : वजन बढ़ाना बड़ा आसान होता है लेकिन कम करना मुश्किल। बढ़ती उम्र में और समय लगता है। खैर इसके बाद वो कुछ टाइमिंग ऐसी हो गई थी कि बढ़े वजन में ही कुछ फिल्में करनी पड़ी। जाली एलएलबी 3 भी उसमें थी।
यह फिल्म कई फिल्म फेस्टिवल में गई है। कोई ऐसी प्रतिक्रिया रही जिसने चौंकाया हो?
अरशद : मुंबई के एक फेस्टिवल में मेरे पात्र के मरने पर लोगों को अच्छा लगा था, यानी मैंने अपना काम अच्छी तरह किया। मेरा काम ही था कि दर्शक मुझसे नफरत करें। जिस पल वह धमाका हुआ, वहां मौजूद हर कोई तालियां बजाने लगा। उस वक्त मैंने सोचा कि शुक्र है महाराज (पात्र का नाम)।
तिग्मांशु : मैं एक प्रतिकिया ढूंढ रहा हूं जो किसी ने नहीं दी। जबकि यह बहुत सोच समझ कर किया फिल्म में किया गया है। मैंने श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण को दिखाया है। वो छवि है। क्लाइमेक्स प्रभु रामचन्द्र जी, लक्ष्मण और सीता माता ने अपने चौदह साल के वनवास में साढ़े ग्यारह साल चित्रकूट में बिताए थे, तो मुझको ऐसा लगता था कि शायद वो श्रीराम हैं।
मुझे एक रहस्यमयी एलिमेंट डालना था। पान सिंह तोमर में भी आखिर में पान सिंह तोमर का पूरा गैंग गांव की तरफ जाता है, एक जगह पानी पीने के लिए वो लोग रुकते हैं तो पान सिंह का भतीजा बोलता है दाऊ वो देखो, भैंसे के साथ एक गंजा आदमी खड़ा था, जो यमराज की छवि थी। मुझको इसमें भी वही चाहिए था कि स्पेशल टास्क फोर्स को रामचंद्र जी का आशीर्वाद प्राप्त है।
एक सीन मे जहां पर लोग अटैक करने से पहले रुके हैं, क्लाइमेक्स में बम फटने की तैयारी हो रही है। एक कैरेक्टर, जो फिल्म में उनका दोस्त बना है, वह कहता है पीछे देख तीन लोग खड़े हैं। दो सेकेंड का शाट है।
अरशद : मेरे ख्याल से कहीं न कहीं फिल्म देखने वालों के रूप में हम लोग सूक्ष्मता को भूल चुके हैं। सीधे-सीधे दिखने वाले दृश्य ही नजर आते हैं।
चित्रकूट में शूटिंग के दौरान का कोई याददगार किस्सा रहा?
तिग्मांशु : चित्रकूट आधा उत्तर प्रदेश में आधा मध्य प्रदेश में है। एक ब्रिज है, जिसे क्रास करते ही लोगों का लहजा बदल जाता है। एक सीन जहां पर राजपाल यादव को वो लोग लेकर जाते हैं, हम वहीं पर शूटिंग कर रहे थे और मैं लोकेशन देखने के लिए असिस्टेंट के साथ आगे बड़ा, तो देखा पेड़ से नीले रंग की नायलान की तार है लटकी हुई है।
उस पर कुछ फटे कपड़े लटके हुए हैं, शर्ट का कालर था और नीचे चप्पल थी, जहां शायद किसी को लटकाया गया था या किसी ने आत्महत्या की थी और शरीर को जानवर खा गया था। बगल में एक अच्छा-खासा हिरण था। उसे कुत्तों के झुंड के साथ दौड़ाते हुए देखा। वहां भी घमासान मचा हुआ था। हालांकि वहां अब भी एसटीएफ तैनात रहती है।
अरशद : मेरे साथ भी एक घटना हुई। मैं रास्ते से जा रहा था एक ही पतला रोड था हम लोग होटल पर जाने के तरफ आगे बढ़े, तो देखा भाईसाहब वहां पर खुले में एक रूम बना है।बाद में पता चला वहां पर शादियां होती हैं। एक भाईसाब ने रोड पर गाड़ी पार्क कर दी थी। मेरे साथ एक इंस्पेक्टर थे, अचानक ट्रैफिक जाम होने लगी। निकलने का वहीं रास्ता था।
सब इंतजार कर रहे थे। मैंने कहा ये क्या हो रहा है, तो लोगों ने बोला कि शादी खत्म होगी, तो वह आकर निकालेगा। पुलिस वाले ने कहा कि जब तक शादी नहीं होगी कोई नहीं हिलेगा। पुलिस वाला बाहर निकला उसने विडियो निकालना शुरू किया, गाड़ी का मालिक फट से आया कि गाड़ी हटा देते हैं। मैंने पूछा यह क्या लाजिक है, फिर उसने बताया कि उसको झगड़े से डर नहीं, बल्कि पांच सौ रुपया फाइन से समस्या है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

