युद्ध की प्रकृति स्थायी है, लेकिन उसका चरित्र लगातार बदलता रहता है। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर शीतयुद्ध, आतंकवाद, हाइब्रिड वारफेयर और अब ड्रोन, साइबर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंतरिक्ष आधारित युद्ध तक तकनीक और भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने युद्ध का स्वरूप लगातार बदला है।
सैन्य इतिहास अतीत नहीं, रणनीतिक सोच का माध्यम
कान्क्लेव की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए पश्चिम यूपी सब एरिया के जनरल आफिसर कमांडिंग मेजर जनरल सुमित राणा ने कहा कि सैन्य इतिहास को केवल घटनाओं, युद्धों और व्यक्तित्वों का क्रम मानना उसकी वास्तविक उपयोगिता को सीमित करना है। इतिहास यह समझने का माध्यम है कि किसी निर्णय के पीछे कमांडर की सोच क्या थी, उसने कौन-से अनुमान लगाए और कौन-सी धारणाएं गलत साबित हुईं।
उन्होंने कहा कि सैन्य इतिहास संस्थागत स्मृति को सुरक्षित रखता है, लेकिन इसका उद्देश्य पुराने फैसलों को सही साबित करना नहीं, बल्कि स्थापित धारणाओं को चुनौती देना भी होना चाहिए। युद्ध को राजनीतिक, सामाजिक, भौगोलिक और आर्थिक संदर्भों से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
मेजर जनरल राणा ने कहा कि सैन्य नेतृत्व उपलब्ध क्षमता को वास्तविक युद्धक शक्ति में बदलता है। एक सैन्य नेता के लिए अनिश्चितता को स्वीकार करना, अवसर पहचानना, परिस्थितियों के अनुसार बदलना और सैनिकों के मनोबल की रक्षा करना जरूरी है।
भविष्य के युद्ध पर उन्होंने कहा कि युद्धक्षेत्र अधिक पारदर्शी, कनेक्टेड, मल्टी-डोमेन और स्वायत्त होता जा रहा है। एआइ, मशीन लर्निंग, ड्रोन, साइबर क्षमता, प्रिसिजन फायर और लंबी दूरी की मारक क्षमता युद्ध को और जटिल बना रही हैं। पारंपरिक ओओडीए (आब्जर्व, ओरिएंट, डिसाइड) लूप के साथ अब ‘सेंस एंड अंडरस्टैंड’ की क्षमता अधिक महत्वपूर्ण होगी। केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि सामने क्या हो रहा है, बल्कि उपलब्ध संकेतों को तेजी से समझकर निर्णय लेना निर्णायक होगा।
उन्होंने रणनीतिक स्वायत्तता को संकट से पहले तैयार करने की जरूरत बताते हुए कहा कि डिजाइन, निर्माण, रखरखाव, मरम्मत और आधुनिकीकरण की घरेलू क्षमता विकसित करना जरूरी है।
मेरठ मिलिट्री हिस्ट्री कान्क्लेव में मौजूद सेना के अधिकारी व अतिथि।
1857 को सिर्फ सैनिक विद्रोह मानना इतिहास के साथ न्याय नहीं : डाॅ. अमित पाठक
इतिहासविद डाॅ. अमित पाठक ने 1857 को भारतीय राष्ट्र चेतना के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी बताया। उन्होंने कहा कि सैन्य रूप से विद्रोह 1858 तक दबा दिया गया, लेकिन इसकी राजनीतिक और सामाजिक गूंज आगे के स्वतंत्रता आंदोलन में बनी रही।
उन्होंने अंग्रेजी इतिहास लेखन में 1857 को देखने के पारंपरिक नजरिये पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे केवल सैनिक विद्रोह के रूप में देखना उचित नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों की भागीदारी ने इसे व्यापक जन-असंतोष का स्वरूप दिया। मेरठ के दस्तावेजों में हिंदू और मुस्लिम सैनिकों द्वारा एक-दूसरे को ‘भाइयों’ के रूप में संबोधित कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ एकजुट होने के आह्वान का उल्लेख भी मिलता है।
डाॅ. पाठक ने कहा कि 1857 की असफलता के पीछे आधुनिक औद्योगिक और संगठित सैन्य शक्ति के सामने पारंपरिक भारतीय समाज की सीमाएं भी थीं। विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने सेना की भर्ती नीति में ‘मार्शल रेस’ जैसी अवधारणाओं का इस्तेमाल किया। उनके मुताबिक 1857 को केवल असफल विद्रोह के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय राष्ट्र चेतना के निर्माण की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखना चाहिए।
1947-48 से सबक नहीं लिया तो इतिहास खुद को दोहरा सकता है : शिव कुनाल वर्मा
उन्होंने सैन्य इतिहास में तकनीकी बढ़त की भूमिका पर जोर देते हुए बताया कि उस दौर में ब्रिटिश सेना के पास करीब 150 गज तक प्रभावी मारक क्षमता वाली नई राइफल थी, जबकि भारतीय सैनिक पुराने और कम मारक क्षमता वाले हथियारों से लड़ रहे थे। उनका संदेश स्पष्ट था—युद्ध में साहस जरूरी है, लेकिन तकनीकी और सैन्य तैयारी की कमी की कीमत भी चुकानी पड़ती है।
वर्मा ने कहा कि 1947-48 के युद्ध को सिर्फ कश्मीर घाटी तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के अभियानों को एक समग्र सैन्य अभियान के रूप में समझने की आवश्यकता है। पुंछ, स्कर्दू, लद्दाख, जोजिला और वायुसेना की भूमिका इस इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
उन्होंने कारगिल युद्ध का संदर्भ देते हुए कहा कि 1947-48 के अनुभवों से बनी संस्थागत स्मृति का पर्याप्त उपयोग नहीं हो सका। सैन्य इतिहास को स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सैन्य अकादमियों में गंभीरता से पढ़ाने की जरूरत है, क्योंकि इतिहास संभावित प्रतिद्वंद्वी की सोच और रणनीति को समझने का साधन भी है।
1947 का पहला हमला पुंछ में हुआ था, इतिहास का व्यापक संदर्भ जरूरी : कर्नल अजय के. रैना
कर्नल अजय के. रैना ने 1947-48 के जम्मू-कश्मीर युद्ध की प्रचलित कथा के कई पहलुओं पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की ओर से हमला 22 अक्टूबर 1947 को मुजफ्फराबाद से शुरू होने की बात आम तौर पर कही जाती है, लेकिन उनके अनुसार जम्मू-कश्मीर रियासत पर पहला आक्रमण 9 अक्टूबर को पुंछ में हुआ था।
उन्होंने 1947 के अभियान में ब्रिटिश सैन्य अधिकारियों की भूमिका, पाकिस्तान की सैन्य योजना और उस समय भारत-पाकिस्तान की सेनाओं में मौजूद ब्रिटिश कमान का उल्लेख किया। उनके मुताबिक एक सैन्य अधिकारी ने एक गुप्त अभियान से संबंधित दस्तावेज देखे और भारत पहुंचकर संभावित हमले की चेतावनी देने की कोशिश की, लेकिन सूचना को अपेक्षित गंभीरता नहीं मिली।
मुजफ्फराबाद पर हमले के बाद उड़ी के पास डोगरा सैनिकों के छोटे दल के प्रतिरोध को उन्होंने निर्णायक बताया। उनके अनुसार करीब 60 से 100 सैनिकों ने कई गुना बड़ी हमलावर शक्ति को कई दिनों तक रोके रखा। यही देरी आगे श्रीनगर की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।
कर्नल रैना ने कहा कि इतिहास की पुस्तकों में इस देरी का श्रेय अक्सर बारामुला में हमलावरों की लूटपाट को दिया जाता है, जबकि डोगरा सैनिकों के प्रतिरोध की भूमिका को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने सैन्य इतिहास को व्यापक स्रोतों और विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर दोबारा देखने की जरूरत बताई।
ड्रोन युद्ध को बदल रहे हैं, लेकिन जमीन पर लड़ाई खत्म नहीं करेंगे : लेफ्टिनेंट जनरल एके सिंह
लेफ्टिनेंट जनरल एके सिंह ने कहा कि 1857 की असफलता को राष्ट्रीय पहचान, समन्वित नेतृत्व और समय से पहले शुरू हुए विद्रोह जैसे कारकों के संदर्भ में समझना होगा। इतिहास को किसी एक पूर्वाग्रह या स्थापित कथा से नहीं, बल्कि अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखना चाहिए।
1947-48 के युद्ध का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस समय भारत के पास सीमित संसाधन और कठिन भूगोल में सैन्य और संचार लाइन बनाए रखने की सीमित क्षमता थी। आज चुनौती और जटिल है, क्योंकि पाकिस्तान परमाणु शक्ति है और चीन भी इस रणनीतिक समीकरण का महत्वपूर्ण पक्ष है।
भविष्य के युद्ध पर उन्होंने कहा कि साइबर स्पेस, ड्रोन, एआइ, रोबोटिक्स और अंतरिक्ष नए युद्धक डोमेन बन चुके हैं। यूक्रेन और ईरान जैसे संघर्षों से यह स्पष्ट है कि ड्रोन पारंपरिक युद्ध का अंत नहीं कर रहे। छोटे पैदल सेना दल, ड्रोन, आर्टिलरी, एयर डिफेंस और अन्य प्रणालियों का एकीकृत इस्तेमाल भविष्य के युद्ध की प्रमुख विशेषता होगा।
उन्होंने कहा कि टैंकों का भविष्य समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन उनका इस्तेमाल अकेले नहीं, बल्कि संयुक्त हथियार प्रणाली के हिस्से के रूप में करना होगा। लंबी अवधि के उच्च तीव्रता वाले संघर्षों के लिए भारत को औद्योगिक और लाजिस्टिक क्षमता मजबूत करनी होगी।
उन्होंने युद्ध में सफलता की बदलती अवधारणा पर भी जोर दिया। भविष्य में जीत केवल प्रतिद्वंद्वी को पराजित करने का नाम नहीं होगी, बल्कि संघर्ष के बाद बेहतर रणनीतिक स्थिति बनाए रखने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
युद्ध विनाश के साथ नवाचार और आर्थिक गतिविधियों को भी जन्म देता है : प्रो. धीरज शर्मा
आइआइएम रोहतक के निदेशक प्रो. धीरज शर्मा ने युद्ध की अर्थव्यवस्था को अलग दृष्टिकोण से समझने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि युद्ध मानव जीवन, संपत्ति और संसाधनों की भारी कीमत वसूलता है, लेकिन सैन्य जरूरतों से विकसित तकनीकों का नागरिक जीवन में इस्तेमाल होने पर नई औद्योगिक और व्यावसायिक गतिविधियां भी पैदा होती हैं।
उन्होंने टूथपेस्ट और जीपीएस के उदाहरणों के माध्यम से बताया कि सैन्य जरूरतों से विकसित या आगे बढ़ी तकनीकों का बाद में व्यापक नागरिक इस्तेमाल हुआ। जीपीएस का विकास सैन्य जरूरतों से हुआ और बाद में इसके नागरिक उपयोग ने पूरी अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा किए।
प्रो. शर्मा ने कहा कि सैन्य खर्च को लेकर दो विपरीत आर्थिक दृष्टिकोण हैं। एक ओर यह रोजगार, उत्पादन और तकनीकी नवाचार को गति दे सकता है, दूसरी ओर अत्यधिक सैन्य खर्च संसाधनों के गलत आवंटन, महंगाई और दीर्घकालिक आर्थिक दबाव का कारण बन सकता है।
उन्होंने भारत के एलसीए कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए सैन्य तकनीक के विकास में लगने वाले लंबे समय और उपकरणों की सीमित उपयोगी आयु पर सवाल उठाया। उनके अनुसार किसी रक्षा परियोजना का मूल्यांकन केवल रणनीतिक जरूरत के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी पूरी आर्थिक लागत और जीवनचक्र के आधार पर भी होना चाहिए।
रूस का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि युद्ध के बावजूद वहां औद्योगिक उत्पादन क्षमता का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। युद्ध की वास्तविक आर्थिक कीमत समझने के लिए सार्वजनिक ऋण, विदेशी मुद्रा भंडार, घरेलू उत्पादन क्षमता और विदेशी उत्पादों पर निर्भरता जैसे संकेतकों को देखना जरूरी है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि युद्ध की अर्थव्यवस्था पर चर्चा का अर्थ युद्ध का समर्थन करना नहीं है। जरूरत इस बात की है कि सैन्य फैसलों के साथ उनके आर्थिक प्रभावों को भी रणनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाए।
अतीत से भविष्य के युद्धक्षेत्र तक पहुंचा विमर्श
कान्क्लेव में सैन्य इतिहास को केवल अतीत के अध्ययन तक सीमित रखने के बजाय उससे भविष्य की सैन्य तैयारियों के लिए सबक लेने पर जोर रहा। 1857 के विद्रोह से लेकर 1947-48 के युद्ध, कारगिल के संस्थागत सबक, सैन्य नेतृत्व, तकनीकी बदलाव, ड्रोन-एआइ आधारित युद्ध और सैन्य खर्च की अर्थव्यवस्था तक विभिन्न सत्रों ने युद्ध को व्यापक रणनीतिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया।
कार्यक्रम में लेफ्टिनेंट जनरल जेएस वर्मा सहित अन्य वरिष्ठ वर्तमान और पूर्व सैन्य अफसर रहे। सीसीएसयू के इतिहास विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कृष्ण कांत शर्मा अभी शोधार्थियों के साथ पहुंचे। स्टेशन कमांडर ब्रिगेडियर एसके सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

