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टाटा संस आईपीओ विवाद: आरबीआई का दबाव या नियंत्रण खोने का डर? जानें बोर्ड रूम वाॅर की असली वजह
टाटा संस के भीतर मचे घमासान की एक बड़ी वजह कंपनी के संभावित आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (IPO) को लेकर उपजा विवाद भी है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सख्त नियमों के तहत होल्डिंग कंपनी टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने का भारी दबाव है। हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स कंपनी पर अपना पारंपरिक नियंत्रण खोने के डर से इस लिस्टिंग के पूरी तरह खिलाफ खड़ा है।
क्या है RBI के नियमों का पेंच?
आरबीआई ने टाटा संस को अपर लेयर एनबीएफसी (गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी) की श्रेणी में रखा है। नियामक नियमों के अनुसार, इस श्रेणी में आने वाली कंपनियों को तय समय-सीमा के भीतर शेयर बाजार में अनिवार्य रूप से लिस्ट होना होता है।
पूर्व चेयरमैन एन चंद्रशेखरन और बोर्ड के कुछ सदस्य पारदर्शिता और नियामक अनुपालन का हवाला देकर जल्द से जल्द आईपीओ लाने या कॉर्पोरेट ढांचे में जरूरी बदलाव के पक्ष में थे।
वर्चस्व की लड़ाई और ट्रस्ट का डर
टाटा स्टील के पूर्व अधिकारी व वित्तीय मामलों के जानकार प्रभात शर्मा के अनुसार, “यह आईपीओ केवल धन जुटाने का जरिया नहीं है, बल्कि समूह पर वर्चस्व की लड़ाई है।
नोएल टाटा और अन्य ट्रस्टियों को डर है कि पब्लिक लिस्टिंग के बाद बाहरी और खुदरा निवेशकों का दखल बढ़ेगा, जिससे टाटा संस में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स का एकाधिकार कमजोर हो जाएगा।
ऐतिहासिक IPO और वैकल्पिक रास्ता
फिलहाल टाटा संस एक अपंजीकृत कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में काम कर रही है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर टाटा संस का आईपीओ आता है, तो यह भारतीय शेयर बाजार के इतिहास का सबसे बड़ा निर्गम साबित हो सकता है।
नए नेतृत्व के सामने बड़ी कानूनी चुनौती
दूसरी ओर, नोएल टाटा ऋण कम करके या किसी वैकल्पिक कॉर्पोरेट पुनर्गठन के जरिए लिस्टिंग से बचने का रास्ता तलाश रहे हैं।
ऐसे में नए चेयरमैन और प्रबंधन को पद संभालते ही सबसे पहले अपनी सार्वजनिक बाजार रणनीतियों पर एक ठोस और त्वरित फैसला लेना होगा।
आरबीआई के सख्त नियमों की अनदेखी करना टाटा समूह के लिए एक बड़ा कानूनी और रणनीतिक संकट खड़ा कर सकता है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

