‘लापता लोगों के मामलों में उम्र-लिंग की परवाह किए बगैर तुरंत FIR करें’, पुलिस की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लापता लोगों के मामलों में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तुरंत एफआईआर करने का उसका आदेश हर व्यक्ति पर लागू होता है, चाहें उसकी उम्र या लिंग कुछ भी हो।
कोर्ट ने कुछ राज्यों द्वारा व्यक्ति शब्द का मतलब सिर्फ बच्चों की गुमशुदगी माने जाने पर हैरानी जताई। शीर्ष अदालत ने कहा कि आदेश पूरी तरह स्पष्ट था।
कोर्ट ने इसका पालन न करने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशकों को अवमानना नोटिस जारी करते हुए आदेश दिया है कि वे अगली सुनवाई पर कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होंगे और कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर बताएंगे कि आदेश की अनदेखी करने और उसका पालन न किए जाने के लिए उनके खिलाफ क्यों न कार्रवाई की जाए?अगली सुनवाई पांच सितंबर को है। ये आदेश गत पांच अगस्त को न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ ने तमिलनाडु के रहने वाले जी. गणेश की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिए, जिनकी बेटी 2011 में चेन्नई से लापता हो गई थी।
इस बात को ध्यान में रखते हुए कि भारत में अभी भी 47,000 बच्चे लापता है, सुप्रीम कोर्ट से 22 मई को देशभर की पुलिस को लापता लोगों के मामले में तुरंत एफआईआर करने का निर्देश दिया था और कहा था कि मानव तस्करी विरोधी यूनिट को चार सप्ताह के भीतर पूरी तरह से काम करने लायक बनाया जाए।
कई निर्देश जारी करते हुए कोर्ट ने लापता बच्चों के मामलों की बढ़ती संख्या पर नाराजगी जताई थी और कहा था कि वे अक्सर संगठित अंतरराज्यीय तस्करी सिंडिकेट का शिकार होते हैं।
शीर्ष अदालत ने गृह मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह देश के हर पुलिस स्टेशन को एक ही प्लेटफार्म से जोड़ने वाला एक ऑल इंडिया ग्रिड बनाए। इस ग्रिड में मानव तस्करी से जुड़ा एक खास पोर्टल हो।
साथ ही एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता 2023 में अपहरण या मानव तस्करी से संबंधित धाराओं को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

