हाल के दिनों में बाघ के हमले में दो लोगों की मौत के बाद वाल्मीकिनगर जंगल क्षेत्र से सटे बगहा दो प्रखंड में दहशत का माहौल है। जंगल और उसके आसपास रहने वाले ग्रामीणों में बाघ का भय इस कदर बढ़ गया है कि अब लोग अकेले घर से बाहर निकलने से भी परहेज करने लगे हैं।
पशुओं के लिए चारा लाने और उन्हें चराने जंगल की ओर जाने वाले ग्रामीण बड़ी संख्या में समूह बनाकर निकल रहे हैं। वहीं, चारा काटने के लिए जंगल अथवा आसपास के इलाकों में जाने वाले लोग भी अधिक से अधिक संख्या में एक साथ जाने को मजबूर हैं।
जंगल क्षेत्र में स्थित कई विद्यालयों के आसपास आए दिन भालू, सांप और अन्य जंगली जानवरों के दिखने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। ऐसे में बाघ के हमले की खबर ने बच्चों के डर को और बढ़ा दिया है।
बिना बाउंड्री वाले विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा बनी चिंता
बगहा दो प्रखंड में करीब सौ ऐसे विद्यालय बताए जा रहे हैं, जहां अभी तक बाउंड्री वॉल नहीं है। इनमें कई विद्यालय जंगल क्षेत्र अथवा जंगल से सटे इलाकों में संचालित हो रहे हैं।
इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को विद्यालय आने-जाने के दौरान जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है।बाघ के हमले की घटना के बाद कई अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय भेजने में भी आशंकित हैं।
इसका असर विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति पर पड़ने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि जब जंगल क्षेत्र में बाघ के मौजूद होने की चर्चा हो और विद्यालय परिसर भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो तो छोटे बच्चों को स्कूल भेजने में डर स्वाभाविक है।
बटेसरा स्कूल में भी दिखा बाघ का खौफ
राजकीय प्राथमिक विद्यालय बटेसरा में भी बाघ की दहशत का असर साफ दिखाई दे रहा है। विद्यालय में बाउंड्री वॉल नहीं होने के कारण बच्चों की सुरक्षा को लेकर प्रधानाध्यापक और अभिभावक चिंतित हैं।
बाघ के भय और इलाके में फैली अफवाहों के कारण विद्यालय में बच्चों की संख्या घटने की बात सामने आई है।विद्यालय के प्रधानाध्यापक मो. रिजवान ने बताया कि बाघ के हमले में दो लोगों की मौत के बाद बच्चों और अभिभावकों में भय का माहौल है।
विद्यालय में चहारदीवारी नहीं है। इस संबंध में बगहा दो बीईओ को पत्र के माध्यम से जानकारी दी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि बाघ के भय के कारण विद्यालय में बच्चों की संख्या में कमी आई है।
दो वर्ष पहले सांप के काटने से छात्रा की हुई थी मौत
बटेसरा विद्यालय में जंगली जानवरों का खतरा कोई नई बात नहीं है। करीब दो वर्ष पहले इसी विद्यालय में सांप के काटने से एक छात्रा की मौत हो चुकी है।
इस घटना के बाद भी विद्यालय में चहारदीवारी नहीं होने से बच्चों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब बाघ के हमले के बाद अभिभावकों की चिंता और बढ़ गई है।विद्यालय प्रबंधन की ओर से इस पूरे मामले से शिक्षा विभाग को अवगत कराया गया है। साथ ही संबंधित अधिकारियों को भी स्थिति की जानकारी दी गई है।
बाघ के भय से रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित
बाघ के हमले के बाद केवल विद्यालय ही नहीं, बल्कि जंगल से सटे गांवों में लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियां भी प्रभावित हुई हैं। पशुओं के लिए चारा लाने, लकड़ी अथवा अन्य जरूरत का सामान लेने जाने वाले ग्रामीण अब अकेले जाने से बच रहे हैं। कई लोग समूह बनाकर ही जंगल अथवा जंगल से सटे इलाकों में जा रहे हैं।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

