जननी सुरक्षा योजना में लापरवाही की वजह से मंडल में बनारस की स्थिति सबसे खराब
जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) के तहत गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली आर्थिक सहायता अब भी कागजों तक सिमटी हुई है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में प्रतिशत बढ़ने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत में पूर्वांचल के जिलों में पेमेंट की रफ्तार बेहद सुस्त है। चंदौली, गाजीपुर, जौनपुर और वाराणसी में हजारों महिलाएं प्रसव के महीनों बाद भी 1400 रुपये की सहायता से वंचित हैं। इसमें बनारस की स्थिति सबसे खराब है।
रिपोर्ट के मुताबिक चंदौली में पेमेंट प्रतिशत 21.46 से बढ़कर 62.44 प्रतिशत हुआ है, लेकिन जिला अभी भी प्रदेश में 50वें स्थान पर है। गर्भवती महिलाएं स्वास्थ्य केंद्रों के चक्कर काट रही हैं, लेकिन आशा वर्कर्स और अधिकारियों की लापरवाही के कारण डीबीटी नहीं हो पा रहा है। गाजीपुर में प्रतिशत 29.90 से 69.20 हो गया, फिर भी रैंकिंग 29 से गिरकर 31वें स्थान पर आ गई।
जिले के कई ब्लाकों में पेमेंट प्रक्रिया जटिल हो चुकी है। महिलाएं बैंक खाते की पुष्टि और दस्तावेजों के लिए बार-बार दौड़ रही हैं, लेकिन नतीजा शून्य है। जौनपुर ने 34.39 प्रतिशत से 81.08 प्रतिशत तक छलांग लगाई है और रैंकिंग तीसरे स्थान पर पहुंच गई, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। कई लाभार्थी बताते हैं कि आंकड़े कागजी हैं, जबकि वास्तविक भुगतान में देरी हो रही है।
ग्रामीण महिलाएं प्रसव के बाद आर्थिक संकट झेल रही हैं। सबसे खराब स्थिति वाराणसी की है। यहां प्रतिशत 26.49 से बढ़कर मात्र 55.01 प्रतिशत हुआ, लेकिन रैंकिंग 38वें से गिरकर 61वें स्थान पर पहुंच गई। जिला स्वास्थ्य समिति की रिपोर्टों में भी कई ब्लाकों में 80-90 प्रतिशत महिलाएं भुगतान से वंचित बताई जा रही हैं।
पिंडरा और बड़ागांव जैसे क्षेत्रों में स्थिति और बदतर है। कागजों पर प्रसव का आंकड़ा लक्ष्य से ज्यादा दिखाया जा रहा है, लेकिन महिलाओं के खातों में राशि नहीं पहुंच रही। योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में 1400 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 1000 रुपये दिए जाते हैं, लेकिन नई गाइडलाइंस और जटिल प्रक्रिया ने भुगतान को और उलझा दिया है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

