विकास के दावों के बीच कपकोट के सीमांत क्षेत्र के कालापैर, कापड़ी, किसमिला, भकोना, खेती सहित कई गांवों के ग्रामीण पिछले नौ वर्षों से अपनी जान जोखिम में डालकर रामगंगा नदी पार करने को विवश हैं। स्कूल जाने वाले मासूम बच्चे भी रोज़ गरारी यानी ट्राली के सहारे नदी पार कर शिक्षा ग्रहण करने पहुंचते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार वर्ष 2018 में अतिवृष्टि के दौरान रामगंगा नदी पर बना झूला पुल बह गया था, जो नाचनी को कालापैर, कापड़ी तथा किसमिला सहित कई गांवों से जोड़ता था। पुल बहने के बाद आज तक नया पुल नहीं बन सका। ग्रामीण बताते हैं कि इस दौरान गरारी के सहारे नदी पार करते समय दो लोगों की मौत हो चुकी है।
ग्रामीणों के हाथ घायल
वहीं जंग लगे लोहे के तार को खींचने के कारण आधे से अधिक ग्रामीणों के हाथ घायल हो चुके हैं। बावजूद इसके, मजबूरी में हर दिन इसी रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ता है। इन गांवों के लोगों की शिक्षा, स्वास्थ्य और दैनिक जरूरतों के लिए सबसे नजदीकी बाजार पिथौरागढ़ जिले का नाचनी है। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर राशन तथा अन्य आवश्यक सामान लाने तक के लिए ग्रामीणों को इसी जोखिम भरे रास्ते से गुजरना पड़ता है।पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण का कहना है कि नौ साल बीत जाने के बाद भी पुल का निर्माण नहीं होना सरकारी दावों पर सवाल खड़े करता है। उनका कहना है कि आखिर विकास की वह गंगा कहां है, जबकि यहां लोग आज भी रामगंगा नदी को गरारी के सहारे पार करने को विवश हैं। उन्होंने सरकार से शीघ्र स्थायी पुल निर्माण की मांग की है।

विकास कुमार सिंह एक अनुभवी भारतीय पत्रकार और द टकसाल न्यूज़ (The Taksal News) के प्रधान संपादक हैं।

