रविवार की रात रैंबो करमा गांव में किसी के घर चूल्हा नहीं जला। सैकड़ों आंखें एक ही घर की ओर लगी थी। कोई प्रार्थना कर रहा था, कोई चमत्कार की बात कर रहा था, कोई कह रहा था—“अभी सांस लौट आएगी।” लेकिन सुबह होते-होते उम्मीद हार गई और एक मासूम जिंदगी हमेशा के लिए बुझ गई।
यह सिर्फ एक किशोर की मौत की खबर नहीं है। यह उस संघर्ष की कहानी है, जहां संकट के समय एक परिवार विज्ञान, परंपरा, भरोसे और बेबसी के बीच झूलता रहा।
मां के साथ जमीन पर सो रहा था मृतक
चौपारण प्रखंड के डेबो पंचायत स्थित रैंबो करमा गांव निवासी अरविंद रविदास का पुत्र ऋषि कुमार दास शनिवार तड़के करीब 3:30 बजे अपने मां के साथ घर में जमीन पर सो रहा था। रात की नींद अचानक एक अनदेखे खतरे में बदल गई। किसी जहरीले सांप ने उसे डंस लिया।
शुरुआत में किसी को स्थिति की गंभीरता समझ नहीं आई। कुछ देर बाद घर में सांप दिखाई दिया और उसे मार दिया गया। तब जाकर परिवार को एहसास हुआ कि मामला सामान्य नहीं है।
रास्ते में चमत्कारी बाबा की मिली जानकारी
ग्रामीणों के अनुसार, पहले स्थानीय स्तर पर पारंपरिक उपाय किए गए। लेकिन ऋषि की हालत बिगड़ती गई। शरीर में विष का असर बढ़ने लगा। रविवार सुबह करीब आठ बजे परिजन उसे लेकर कोडरमा सदर अस्पताल पहुंचे। वहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। लेकिन परिजन हार मानने को तैयार नहीं थे।
परिवार उसे लेकर बरही के एक अस्पताल पहुंचा। उम्मीद थी कि शायद कोई रास्ता निकल आए। जब वहां भी निराशा हाथ लगी। बरही से लौटते वक्त लराही गांव में किसी सज्जन ने कोडरमा के एक चमत्कारी तांत्रिक की जानकारी दे दी।
मंत्र तंत्र की शक्ति ठीक करने का दावा
दावा किया गया कि उक्त बाबा गोमूत्र, गोबर, औषधि और मंत्र तंत्र की शक्ति से अनहोनी को ठीक कर सकता है। गांव में एक और संभावना खोजी गई । चमत्कार की आस में ग्रामीणों की सलाह पर उक्त तांत्रिक को बुलाया गया।
बताया जाता है कि उसने कोई शुल्क नहीं लिया और अपनी परंपरागत मान्यता के अनुसार प्रयास शुरू किया। घर के पास गड्ढा खोदा गया। उसमें गोबर और गौमूत्र डाला गया। किशोर के शरीर को वहां रखकर पानी से पूरा गड्ढा भर दिया गया।केवल बच्चे का सिर बाहर रहा। झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र शुरू हुआ।
रविवार दोपहर से सोमवार तड़के तक यह सिलसिला चलता रहा। गांव के लोग जुटते रहे। कोई मंत्र सुन रहा था, कोई दुआ कर रहा था, कोई बस इंतजार कर रहा था कि शायद अभी आंख खुल जाए। लेकिन जीवन नहीं लौट सकी। परिजनों ने अंततः बेटे को विदाई दी।
झाड़-फूंक पर उठ रहे सवाल
यह घटना अंधविश्वास पर बहस भर नहीं है। यह उस ग्रामीण वास्तविकता को भी सामने लाती है, जहां संकट की घड़ी में लोग अस्पताल भी जाते हैं और चमत्कार भी तलाशते हैं। सवाल केवल इतना नहीं कि लोगों ने झाड़-फूंक क्यों कराई।
सवाल यह भी है कि क्या हर गांव तक समय पर भरोसेमंद चिकित्सा, जागरूकता और आपातकालीन सहायता पहुंच पा रही है?
सांप के डंसने के मामलों में विशेषज्ञ एक बात दोहराते हैं हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। कई बार इलाज और इंतजार के बीच का अंतर ही जीवन और मृत्यु का अंतर बन जाता है। यह पूरा वाक्या सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो गया है।


