दयारा बुग्याल एक ऐसा ट्रेक जिसे देश-दुनिया के पर्वतारोहियों और पर्यटकों के लिए सबसे शांत, खुला और सुरक्षित माना जाता है।
लेकिन इसी खूबसूरत वादी के ‘गोई’ पड़ाव से रामनगर (नैनीताल) की रहने वाली एमबीए छात्रा बबीता पांडे के रहस्यमय ढंग से लापता होने की घटना ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है।
10 दिनों से जारी सघन सर्च ऑपरेशन, ड्रोन और हेलीकॉप्टर की उड़ानों के बाद भी बबीता का कोई सुराग न मिलना कई अनसुलझे सवाल खड़े कर रहा है।
रैथल गांव में पसरा सन्नाटा
भटवाड़ी से आगे चढ़ाई चढ़ते ही बांद्राणी बैंड के पास नीचे उतरते एसडीआरएफ, पुलिस और एसओजी के वाहनों में बैठे जवानों के चेहरों की थकान और मायूसी बिना कुछ कहे बहुत कुछ बयां कर रही थी। अमूमन ट्रेकर्स की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला बेस कैंप ‘रैथल’ रविवार की शाम को पूरी तरह शांत और उदास था।
कई दिनों तक अपनी लाडली की राह तकने के बाद बबीता के मां, भाई और अन्य परिजन भी भारी मन से वापस रामनगर लौट चुके हैं। गांव के टैक्सी स्टैंड पर सोलर लाइटों की मद्धम रोशनी में वन विभाग के कर्मचारी और स्थानीय ग्रामीण इसी अनहोनी को लेकर चर्चाओं में डूबे दिखे।
मिले भालुओं के संघर्ष के निशान
वर्ष 2002 से रैथल में होमस्टे चला रहे 70 वर्षीय बुजुर्ग बीर सिंह राणा कहते हैं, “हमारी कई पीढ़ियां दयारा बुग्याल में त्योहार मनाती आई हैं, लेकिन अपने जीवन में ऐसा रहस्यमय मामला मैंने कभी नहीं देखा।”
बीर सिंह ने सर्च ऑपरेशन से जुड़ा एक बेहद अहम और चौंकाने वाला पहलू साझा किया। उन्होंने बताया कि जब ग्रामीण पुलिस टीम के साथ जंगलों को खंगाल रहे थे, तब घटनास्थल से महज 600 मीटर की दूरी पर भालुओं के आपस में संघर्ष करने के गहरे संकेत मिले हैं।
चूंकि यह समय भालुओं के प्रजनन का होता है, इसलिए मादा भालू इस दौरान अत्यधिक आक्रामक हो जाती हैं। हालांकि, मौके पर किसी मानव संघर्ष या बबीता से जुड़े निशान नहीं मिले हैं।
क्या निचले रास्तों की तरफ निकल गई बबीता?
रात के सन्नाटे में ग्रामीणों के बीच एक और थ्योरी बार-बार तैरती रही। स्थानीय अनुभवी लोगों का मानना है कि बबीता शायद इन ऊंची और कठिन वादियों में ऊपर की तरफ नहीं गई, बल्कि रास्ता भटकने के बाद वह पैदल ही नीचे के मैदानी या कम ऊंचाई वाले इलाकों की ओर निकल गई हो।
चर्चा के दौरान एक अन्य बुजुर्ग ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि सालों पहले इस इलाके में एक पालतू बैल अचानक लापता हो गया था, जिसका काफी ढूंढने के बाद भी आज तक कभी कोई सुराग नहीं मिल सका।
एक अनसुलझा सवाल: आखिर बबीता कहां है?
जैसे-जैसे पहाड़ों पर रात का अंधेरा गहराता है, दयारा बुग्याल की वादियों की शांति और डरावनी लगने लगती है। तमाम आधुनिक तकनीकों, ड्रोन कैमरों, हेलीकॉप्टर सर्च और सैकड़ों जवानों की दिन-रात की मेहनत के बाद भी नतीजा ‘शून्य’ है।
अहम सवाल
पहाड़ों की इस शांत वादी के बीच आज हर किसी के जेहन में सिर्फ एक ही सवाल लगातार गूंज रहा है आखिर इतनी सुरक्षा और खुले रास्तों के बावजूद बबीता अचानक कहां ओझल हो गई? क्या वह किसी हादसे का शिकार हुई, रास्ता भटकी या फिर इसके पीछे कोई और गहरी मिस्ट्री है? जवाब फिलहाल वक्त के गर्त में है।


