भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश होने के बावजूद अब जनसंख्या विस्फोट की बजाय घटती जन्म दर की ओर बढ़ रहा है। हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, भविष्य में भारत बुजुर्गों का देश बन सकता है। टेस्ला और स्पेसएक्स के सीईओ एलन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस मुद्दे को उठाते हुए चिंता जाहिर की है। इसमें दिल्ली की हालत बेहद खराब दिख रही है।
नॉर्वे और फिनलैंड से भी पीछे है दिल्ली
एलन मस्क ने एक ग्राफ शेयर करते हुए लिखा कि भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) अब रिप्लेसमेंट लेवल (2.1) से नीचे पहुंच चुकी है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि देश की राजधानी दिल्ली की प्रजनन दर मात्र 1.2 रह गई है, जो फिनलैंड (लगभग 1.3) और नॉर्वे जैसे विकसित यूरोपीय देशों से भी कम है।
दरअसल, दिल्ली, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अब प्रजनन दर कई स्कैंडिनेवियाई देशों और संयुक्त राज्य अमेरिका के बराबर या उससे भी कम है। अलग-अलग राज्यों में प्रजनन दर इस प्रकार से हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय की देखरेख में रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के कार्यालय की ओर से यह रिपोर्ट प्रकाशित की गई है। भारत का कुल फर्टिलिटी रेट प्रति महिला 1.9 (राष्ट्रीय औसत) है। शहरी क्षेत्रों का औसत 1.5 है, जबकि ग्रामीण भारत में यह औसत 2.1 है।
टीएफआर क्या है?
टोटल फर्टिलिटी रेट (टीएफआर) एक महिला के पूरे प्रजनन काल (15-49 वर्ष) में औसतन कितने बच्चे पैदा करने की संभावना को दर्शाता है। आबादी को स्थिर रखने के लिए इसे कम से कम 2.1 होना चाहिए। इससे नीचे जाने पर लंबे समय में आबादी घटने और बूढ़ी होने का खतरा बढ़ जाता है।
मसलन, जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों में हो रहा है। सरकारी आंकड़ों (एसआरएस 2024) के मुताबिक, भारत की राष्ट्रीय टीएफआर अब 1.9 रह गई है, जो एक दशक पहले 2.3 थी। दिल्ली में यह और भी कम है, जबकि केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे राज्य भी 1.3 के आसपास हैं।
गिरावट के मुख्य कारण
- महानगरों में बच्चों की परवरिश का बढ़ता खर्च (शिक्षा, स्वास्थ्य, रहन-सहन)
- महिलाओं की उच्च शिक्षा और करियर पर फोकस
- शहरीकरण, देर से शादी और छोटे परिवार की बढ़ती पसंद
- बदलती जीवनशैली और व्यक्तिगत प्राथमिकताएं
- दिल्ली में बढ़ता प्रदूषण भी इसका एक बड़ा कारण हो सकता है
- युवाओं में बढ़ती ध्रूमपान और नशे की लत
ध्यान देने की है जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिरावट विकास का संकेत भी है, लेकिन अगर यही रुझान जारी रहा तो भविष्य में युवा कार्यबल की कमी, बढ़ती बुजुर्गों की संख्या और सामाजिक सुरक्षा पर दबाव जैसे चुनौतीपूर्ण सवाल खड़े हो सकते हैं। फिलहाल, भारत की आबादी अभी युवा है और जनसंख्या बढ़ रही है, लेकिन मस्क जैसे वैश्विक आवाजों ने इस ट्रेंड को गंभीरता से लेने की जरूरत पर जोर दिया है।


