पश्चिम बंगाल में ममता की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर की कलह खुल कर सामने आ गई है। बुधवार को जब निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के साथ 58 विधायकों का कुनबा विधानसभा पहुंचा, तो सियासी हलचल तेज हो गई।
कयासों का बाजार गर्म है कि क्या TMC टूट रही है? क्या ममता बनर्जी के हाथ से पार्टी निकल जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल कि दलबदल विरोधी कानून इन विद्रोहियों को बचाएगा या ममता की पार्टी हिला देगा?
कहां से शुरू हुआ विवाद?

TMC ने कथित पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में सोमवार को ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। उस समय निलंबित TMC नेता रिजू दत्ता ने खुलकर कहा कि बंगाल में अब शिवसेना का ‘महाराष्ट्र मॉडल’ लागू हो रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, विद्रोही गुट का चेहरा ऋतब्रत बनर्जी बन सकते हैं। उनका दावा है कि उनके पास दो-तिहाई विधायकों का समर्थन है।
TMC के विधानसभा में कुल कितने सदस्य हैं?
फिलहाल TMC के विधानसभा में 80 विधायक हैं यानी गणित साफ है दो-तिहाई मतलब52 विधायक। अगर ये आंकड़ा हकीकत है तो कानूनी लड़ाई दिलचस्प होने वाली है। फिलहाल विधायकों की बैठक चल रही है और सियासी पारा चरम पर है।
दलबदल विरोधी कानून क्या कहता है?
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची दल-बदल विरोधी कानून इस पूरे मामले का केंद्र है।
नियम सरल लेकिन सख्त है।
- अगर कोई विधायक अपनी मर्जी से पार्टी की सदस्यता छोड़ दे या पार्टी व्हिप के खिलाफ वोट दे तो वह अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- पहले 1/3 सदस्यों के अलग होने को ‘विभाजन’ माना जाता था और वे बच जाते थे।
- लेकिन 2003 में 91वें संशोधन के बाद यह प्रावधान खत्म कर दिया गया। अब सिर्फ ‘विलय’ ही मान्य है।
दो-तिहाई संख्या का खेला
अलग गुट बनाने वाले विधायकों को अयोग्यता से बचने के लिए अपनी मूल पार्टी के कुल विधायकों की दो-तिहाई संख्या (2/3) का समर्थन जरूरी है। उदाहरण के तौर पर, महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे गुट के पास शिवसेना के दो-तिहाई से ज्यादा विधायक थे, इसलिए वे अयोग्य नहीं ठहराए गए।


