केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के अध्यापकों ने जान जोखिम में डालकर करीब 50 हेक्टेयर जंगल में लगी आग को बुझाया। वनकर्मियों के साथ छह बजे आरंभ किया गया यह अभियान रात दस बजे तक चला।
खड़ी पहाड़ी पर कठिन परिस्थितियों में चलाई गई इस मुहिम में कुछ अध्यापक फिसलन और कांटे चुभने से थोड़ा बहुत घायल भी हुए। देर रात रास्ता भटकने और उजाले की व्यवस्था न होने के कारण इन्हें बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा।
अफरातफरी का माहौल
अलकनंदा के बायें किनारे पर बसे कंेद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर में शुक्रवार अपराह्न लगभग चार बजे अफरातफरी का माहौल उत्पन्न हो गया, जब पौड़ी के सबदरखाल की ओर से लगी आग परिसर की ओर आने लगी। चीड़ के पेड़ों से उठती आग की लपटों और भारी धुएं से वातावरण घुटनभरा हो गया।
परिसर प्रशासन ने इस संबंध में वन विभाग के पौड़ी कार्यालय को सूचना दी। वहां से दो फॉरेस्ट गार्ड भेजे गये, परंतु नृसिंहाचल पर खड़ी चढ़ाई और ऊपर जाने का रास्ता न होने के कारण वनकर्मी असमंजस में पड़ गये।
इस पर श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर के निदेशक प्रो पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने आनन-फानन में परिसर और बालगुरुकुल के अध्यापकों की एक टीम बनाई और स्वयं टीम का नेतृत्व करते हुए खड़ी पहाड़ी पर चढ़कर मौके के लिए रवाना हुए। परिसर की लगभग 12 फुट ऊंची बाउंड्रीवाल को किसी तरह पार कर ये लोग लगभग डेढ़ घंटे में नृसिंह मंदिर के नीचे घटनास्थल पर पहुंचे। चीड़ की पत्तियों, बीजों, सूखी घास और हवा के कारण वहां आग भड़क रही थी।
कुछ अध्यापक घायल
वन विभाग के कर्मचारियों नरोत्तम प्रसाद और मुकेश नेगी ने पहले मोर्चा संभाला और अध्यापकों की टीम को अपने निर्देशन में कार्य करने को कहा। तीखे ढाल और चीड़ की सूखी पत्तियों की फिसलन के कारण आग पर नियंत्रण पाना बहुत कठिन हो रहा था। इस बीच अंधेरा होने लगा तो मुश्किल और बढ़ गई। पूरी टीम ने लगभग डेढ़ घंटे की बड़ी मशक्कत के बाद आग बुझा दी। इस दौरान फिसलने और कांटे चुंभने से कुछ अध्यापक घायल भी हो गये।
टीम को घटनास्थल पर अनेक पक्षी जले और अधजली अवस्था में मिले। लगभग 50 हेक्टेयर जंगल में आग बुझाकर टीम ने राहत की सांस ली और इस प्रकार श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर को आग की चपेट में आने बचा लिया गया। बिना संसाधनों के किसी तरह यह आग तो बुझा ली गई, परंतु इसके बाद अध्यापकों की टीम जंगल में रास्ता भटक गई।
पानी की कमी और प्रकाश का अभाव होने के कारण एक कदम भी चलना मुश्किल हो गया। टीम ने खेड़ा गांव की ओर जाकर वहां शरण लेने का मन बनाया, परंतु लगभग दो किलोमीटर चलने के बाद ये लोग रास्ता भटक गये। इसके बाद किसी तरह परिसर ये लोग रात लगभग 10 बजे तक परिसर में पहुंचे। टीम में डॉ वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल, डॉ सुरेश शर्मा, डॉ सुखदेव सिंह ,डॉ प्रदीप कुमार, डॉ सूर्यकांत चौबे, करुण कुमार, दिगंबर रतूड़ी, सुनील गोदियाल और संपदा अधिकारी उमाकांत भट्ट शामिल थे।
गौरतलब है कि वर्ष, 2024 में भी परिसर के तीन ओर से भारी आग लग गई थी। परिसर के भवनों की छतों पर अग्निशमन यंत्रों से बड़ी मुश्किल से इस आग को बुझाया गया था, परंतु फिर भी परिसर की बाउंडी वाल पर लगे बिजली के केबल आग की भेंट चढ़ गये थे। इससे परिसर को लगभग 30 लाख का नुकसान हुआ था।
इस संबंध में निदेशक प्रो सुब्रह्मण्यम ने बताया कि विकट परिस्थितियों में बिना संसाधनों के टीम ने यह साहसिक कार्य कर परिसर की बड़ी क्षति होने से बचाया है। जिस हिसाब से टीम ने मौके पर जोश और जुनून के साथ यह कार्य किया, वह स्वयं में प्रशंसनीय और प्रेरणादायक है। यह परिसर के प्रति अध्यापकों की गहन श्रद्धा का प्रमाण है।
प्रो सुब्रह्मण्यम ने बताया कि दावानल की घटनाओं के दृष्टिगत अब परिसर की जंगल से लगती सीमा पर सीमेंट का लगभ 18 फुट चौड़ा मार्ग बनाया जाएगा। इससे परिसर में आग को आने से रोका जा सकेगा। अगले छह माह में हम प्रकृति के अनुकूल ऐसी व्यवस्थाएं करेंगे कि हम इस आपदा से सुरक्षित रह सकें।
कुलपति प्रो0 श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि प्रो पीवीबी सुब्रह्मण्यम के मार्गदर्शन में अध्यापकों की टीम ने साहस का कार्य कर परिसर को दावानल के आगोश में आने से बचाया है। इस सराहनीय कार्य के लिए परिसर की यह टीम बधाई की पात्र है।


