महुआ पेड़ों की होगी जियो-टैगिंग, झारखंड में महुआ चुनने वालों का बनेगा डेटाबेस; जंगल में आग लगाने वालों पर सख्त निगरानी

 जंगलों में हर वर्ष लगने वाली आग पर नियंत्रण पाने के लिए वन, पर्यावरण एवं मौसम परिवर्तन विभाग के स्थानीय दक्षिणी वन प्रमंडल ने नई और सख्त पहल शुरू की है। प्रमंडल क्षेत्र में फैले महुआ पेड़ों की गणना कराई जा रही है।

साथ ही, महुआ पेड़ों की जियो टैगिंग भी की जाएगी, ताकि हर पेड़ का सटीक स्थान प्रमंडल के रिकार्ड में दर्ज हो सके। दक्षिणी वन प्रमंडल पदाधिकारी का मानना है कि महुआ चुनने के दौरान पेड़ों के नीचे सूखी पत्तियों में आग लगाने से जंगलों को भारी नुकसान पहुंचता है।

यही कारण है कि अब तकनीक और निगरानी दोनों का सहारा लिया जाएगा। दक्षिणी वन प्रमंडल क्षेत्र में सात से आठ लाख महुआ पेड़ होने का अनुमान है। विभिन्न बीटों में वनकर्मियों की टीम पेड़ों की संख्या दर्ज कर रही है। यह अभिनव अभियान दो-ढाई महीना पहले प्रारंभ हुआ है।

इस दौरान अब तक बीस से पचीस हजार पेड़ों की गणना हो चुकी है। साथ ही, उन ग्रामीणों की सूची भी तैयार की जा रही है, जो महुआ फूल चुनने का कार्य करते हैं। सूची में संबंधित व्यक्ति का नाम, पता और गांव की जानकारी दर्ज की जा रही है।

प्रमंडल का स्पष्ट कहना है कि यदि सूचीबद्ध क्षेत्र के महुआ पेड़ों के आसपास आग लगने की घटना सामने आती है, तो संबंधित ग्रामीणों के विरुद्ध वन अधिनियम की धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी।

तकनीक और जवाबदेही से जंगल बचाने की तैयारी

वन प्रमंडल पदाधिकारी का कहना है कि जंगलों में आग लगने से केवल पेड़-पौधे ही नहीं जलते, बल्कि वन्य जीवों का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। आग के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित होती है और छोटे पौधे नष्ट हो जाते हैं।

महुआ सीजन में कई लोग फूल चुनने में आसानी के लिए पेड़ों के नीचे आग लगा देते हैं, जिससे आग धीरे-धीरे बड़े क्षेत्रों में फैल जाती है। इसी समस्या को देखते हुए जियो टैगिंग की योजना बनाई है।

इससे यह पता लगाना आसान होगा कि किस क्षेत्र में आग लगी और वहां महुआ चुनने का कार्य कौन कर रहा था। ग्रामीणों को जागरूक करने का भी अभियान चला रहा है।

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