हिमाचल शहरी निकाय चुनाव में कांग्रेस के गढ़ों में भाजपा की सेंध, मंत्रियों के गृह क्षेत्रों में बदला सियासी गणित

जिले के शहरी निकाय चुनाव ने इस बार हिमाचल की राजनीति को नए संकेत दिए हैं। चुनाव परिणाम में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि कांग्रेस अपने पारंपरिक गढ़ माने जाने वाले रामपुर, ठियोग और सुन्नी जैसे क्षेत्रों में भी एकतरफा बढ़त कायम नहीं रख पाई।

भाजपा ने इन इलाकों में मजबूत प्रदर्शन कर साफ संकेत दिया है कि वह अब कांग्रेस के सुरक्षित माने जाने वाले क्षेत्रों में भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर रही है। वहीं मंत्रियों के विधानसभा में भी सियासी समीकरण बदले हैं।

सबसे अहम मुकाबला नगर परिषद रामपुर में देखने को मिला, जहां कांग्रेस समर्थित और भाजपा समर्थित उम्मीदवारों के बीच बराबरी रही। यहां कांग्रेस समर्थित चार और भाजपा समर्थित चार उम्मीदवार विजयी हुए, जबकि एक सीट निर्दलीय के खाते में गई।

कांग्रेस की बराबरी तक पहुंची भाजपा

रामपुर लंबे समय से कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है और यहां से कांग्रेस विधायक नंदलाल प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में भाजपा का बराबरी तक पहुंचना कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार भाजपा ने स्थानीय मुद्दों और संगठनात्मक रणनीति के दम पर यहां अपनी पकड़ मजबूत की है।

नगर परिषद ठियोग में भी कांग्रेस को अपेक्षित बढ़त नहीं मिल सकी। यहां कांग्रेस और भाजपा दोनों के तीन-तीन समर्थित उम्मीदवार विजयी हुए, जबकि एक निर्दलीय प्रत्याशी जीता। भाजपा इस निर्दलीय को अपना समर्थित होने का दावा कर रही है।

ठियोग कांग्रेस विधायक कुलदीप सिंह राठौर का क्षेत्र है, इसलिए यहां भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस के लिए चिंता का कारण माना जा रहा है। भाजपा नेताओं ने इसे जनता का कांग्रेस सरकार के विरुद्ध संदेश बताया है।

सबसे बड़ा राजनीतिक झटका नगर पंचायत कोटखाई में देखने को मिला। यहां भाजपा ने कांग्रेस से निकाय छीनते हुए पांच सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस केवल दो सीट तक सिमट गई। कोटखाई शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर के विधानसभा क्षेत्र जुब्बल-कोटखाई का हिस्सा है, इसलिए इस हार को मंत्री की राजनीतिक प्रतिष्ठा से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

कांग्रेस ने नगर पंचायत जुब्बल में वापसी की

हालांकि कांग्रेस ने नगर पंचायत जुब्बल में वापसी करते हुए भाजपा से सत्ता छीन ली। यहां कांग्रेस समर्थित छह उम्मीदवार विजयी हुए, जबकि भाजपा को एक सीट पर संतोष करना पड़ा। इसके बावजूद नगर पंचायत अध्यक्ष की हार कांग्रेस के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है।

सुन्नी और नेरवा के नतीजों ने भी राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। नगर पंचायत सुन्नी, जोकि लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह के विधानसभा क्षेत्र शिमला ग्रामीण का हिस्सा है, वहां भाजपा को बढ़त मिलना कांग्रेस के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है। सुन्नी में भाजपा समर्थित चार, कांग्रेस के दो व एक निर्दलीय ने जीत दर्ज की है।

वहीं नगर पंचायत नेरवा में चार विजयी उम्मीदवार खुद को भाजपा समर्थित बता रहे हैं, जबकि तीन अन्य पार्षदों ने अभी खुलकर किसी दल का समर्थन नहीं किया है। ऐसे में यहां सत्ता गठन को लेकर राजनीतिक जोड़तोड़ तेज होने की संभावना है।

इन जगहों पर बना रहा कांग्रेस का प्रभाव

चिड़गांव और चौपाल में हालांकि कांग्रेस अपना प्रभाव बनाए रखने में सफल रही। नगर पंचायत चिड़गांव में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों ने बढ़त बनाई, जबकि नगर पंचायत चौपाल में कांग्रेस के पांच उम्मीदवार जीतकर आए। चौपाल भाजपा विधायक बलबीर वर्मा का क्षेत्र है, ऐसे में यहां भाजपा को झटका लगा है।

इन चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया है कि हिमाचल की राजनीति में अब मुकाबला पहले से ज्यादा संतुलित और चुनौतीपूर्ण हो गया है। भाजपा ने कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में सेंध लगाकर अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई है, जबकि कांग्रेस ने कुछ इलाकों में पकड़ बनाए रखकर राहत जरूर हासिल की है।

राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि ये नतीजे आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के लिए बड़े संकेत हैं। खासकर मंत्रियों और विधायकों के क्षेत्रों में बदले समीकरण यह बता रहे हैं कि स्थानीय स्तर पर जनता अब सीधे प्रदर्शन के आधार पर राजनीतिक फैसले लेने लगी है।

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