जिला के गोला प्रखंड से बीस किलोमीटर दूर बसे हरना,उपरबरगा, आसाडीबागान,सुथरपुर सहित कई गांवों में आज भी जिंदगी संघर्ष के सहारे चल रही है। यहां के गरीब परिवारों के लिए केंदु पत्ता केवल जंगल की उपज नहीं, बल्कि पूरे साल परिवार का सहारा बनने वाली उम्मीद है।
गर्मी शुरू होते ही यानी अप्रैल -मई के महीनों में गांवों में रोजी-रोटी की तलाश तेज हो जाती है। और ग्रामीण जंगलों की कठिन राह पकड़ लेते हैं। यही दो महीनों में पूरे परिवार का गुजारा वर्ष भर होता है।
रात में ही घर से निकल जाते हैं लोग
बताया जाता है कि कई परिवार शाम का बना खाना टिफिन में बांधकर रात में ही टाटा-बरकाकाना पैसेंजर ट्रेन के सहारे दूर जंगलों वाले इलाकों तक पहुंचते हैं। स्टेशन, प्लेटफॉर्म और सुनसान जगहों पर रात गुजारने के बाद सुबह होते ही महिलाएं, बुजुर्ग और युवक केंदु पत्ता तोड़ने जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं।
तपती धूप,पथरीले रास्ते,पहाड़ी चढ़ाई, जंगली जानवरों और हाथियों के डर के बीच घंटों तक पत्तियां तोड़ना इनके जीवन का हिस्सा बन चुका है।ग्रामीण बताते हैं कि कई बार दिनभर मेहनत के बाद भी खाने तक का समय नहीं मिल पाता।
पानी और सूखे चूड़ा के सहारे पूरा दिन
पानी और सूखे चूड़ा के सहारे पूरा दिन काटना पड़ता है। पत्तों को सहेजकर गठरी बनाना और फिर उसे कई किलोमीटर तक ढोना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं होता। लेकिन घर में भूखे बच्चों का चेहरा और परिवार की जिम्मेदारी इन्हें हर दिन फिर जंगल की ओर जाने को मजबूर कर देती है।
ग्रामीण परिवेश के लोग कहते हैं कि केंदु पत्तों की बिक्री से मिलने वाली रकम से बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, कपड़े और सालभर की जरूरतें पूरी होती हैं। सामान्य तौर पर केंदु पत्ता तोड़ने वालों की संख्या 500 के आसपास है। लेकिन प्रत्यक्ष रूप में दो हजार लोगों को रोजगार उपलब्ध हो रहा है।
पूरे महीने तपती धूप में सुखाया जाता है
केंदु पत्ता तोड़ने के बाद पूरे महीने इनको तपती धूप में सुखाया जाता है। बरसात के मौसम में इन्हें प्लास्टिक के बोरा में पैक किया जाता है। फिर व्यापारी इन्हें खरीद लेते हैं। कई परिवारों की टूटी आर्थिक स्थिति को यही मेहनत संभाल रही है। महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस संघर्ष में भागीदारी निभा रही हैं।
जंगलों में जोखिम और अभाव के बीच गुजर रही यह जिंदगी दर्दनाक जरूर है, लेकिन संघर्ष और मेहनत की मिसाल भी है। केंदु पत्ता अब इन परिवारों के लिए सिर्फ जंगल का पत्ता नहीं, बल्कि उम्मीद, साहस और बदलती तकदीर की पहचान बन चुका है।


