सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में जारी अवैध रेत खनन को लेकर राजस्थान सरकार और अधिकारियों को फटकार लगाई है।
शीर्ष न्यायालय ने कहा कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैले इस अभयारण्य में अवैध खनन से घडि़याल समेत कई जलीय और विलुप्तप्राय वन्यजीवों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान सरकार का आचरण इस मामले में व्याप्त गंभीर मुद्दों के प्रति पूरी तरह से लापरवाही, उदासीनता और सुस्ती दर्शाता है।
यह मामला राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के भीतर बड़े पैमाने पर अवैध खनन, पर्यावरणीय गिरावट और संरक्षित वन्यजीव निवास के विनाश से संबंधित है।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य, जिसे राष्ट्रीय चंबल घडि़याल वन्यजीव अभयारण्य भी कहा जाता है, 5,400 वर्ग किलोमीटर का त्रिराज्यीय संरक्षित क्षेत्र है। लुप्तप्राय घडि़याल (लंबी थूथन वाला मगरमच्छ) के अलावा, यह लाल मुकुट वाले छत कछुए और लुप्तप्राय गंगा नदी डॉल्फिन का भी घर है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने राजस्थान के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और खनन, वित्त, वन, पर्यावरण तथा परिवहन व सड़क सुरक्षा विभागों के प्रमुख सचिवों को 20 मई को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी अधिकारियों से अलग-अलग हलफनामे दाखिल कर दो अप्रैल के आदेश के पालन की जानकारी देने को कहा है।
दरअसल, दो अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकारों को अमीकस क्यूरी और सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (सीईसी) की रिपोर्टों पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था। इन रिपोर्टों में चंबल अभयारण्य में बड़े पैमाने पर अवैध खनन गतिविधियों का उल्लेख किया गया था।
अदालत ने राज्यों और पर्यावरण मंत्रालय से संरक्षण एवं निगरानी उपायों पर भी हलफनामा मांगा था। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर सवाल उठाया कि बिना पंजीकरण वाले ट्रैक्टर और खनन वाहन अब भी खुलेआम कैसे चल रहे हैं।


