श्रमिक दिवस: दो वक्त की रोटी के लिए रोज जंग, भूख की मंडी में बेबस हैं कामगार

 एक ओर देशभर में मजदूर दिवस को लेकर श्रमिकों के सम्मान की बातें हो रही हैं। वहीं दूसरी ओर हापुड़ के अतरपुरा चौपला पर हर सुबह कामगारों की जिंदगी की कड़वी सच्चाई सामने आ जाती है।

पिछले 50 साल से अधिक वर्षों से प्रतिदिन सुबह के पांच बजते ही यहां कामगारों का जमावड़ा लग जाता है। यहां जिले ही ही नहीं बल्कि, बुलंदशहर, मेरठ, अमरोहा और अन्य जिलों से कामगार आते हैं। कोई राजमिस्त्री है, कोई पेंटर, तो कोई दिहाड़ी कामगार, सबकी मंजिल एक ही है, किसी तरह दिनभर का काम मिल जाए ताकि परिवार का पेट भर सके।

इन कामगारों के लिए हर दिन एक परीक्षा की तरह होता है। हाथों में औजार और आंखों में उम्मीद लिए यह लोग सड़क किनारे खड़े रहते हैं। जैसे ही कोई ठेकेदार या मालिक वहां पहुंचता है, सभी उसकी ओर लपकते हैं। कुछ को काम मिल जाता है, लेकिन कई कामगार घंटों इंतजार के बाद भी मायूस होकर घर लौटने को मजबूर हो जाते हैं। न तो इनके लिए कोई स्थाई रोजगार व्यवस्था है और न ही सामाजिक सुरक्षा की ठोस योजना। प्रशासनिक दावों के बीच इन कामगारों की जिंदगी आज भी संघर्ष की कहानी बयां कर रही है।

काम मिले तो बच्चों का पेट भरता है

पिछले दस वर्षों से दिहाड़ी मजदूरी कर रहे हैं। वह रोज सुबह चार बजे उठकर यहां पहुंच जाते हैं। अगर सुबह जल्दी आ जाऊं तो काम मिलने की उम्मीद थोड़ी बढ़ जाती है। कई बार पूरा दिन खड़े रहने के बाद भी खाली हाथ लौटना पड़ता है। उस दिन बच्चों को कैसे खिलाएं, यही चिंता सताती रहती है।

मजदूरी कम, खर्चा ज्यादा

पहले 600-700 रुपये तक की मजदूरी मिल जाती थी, लेकिन अब कई ठेकेदार 400-500 रुपये में ही काम कराना चाहते हैं। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि घर चलाना मुश्किल हो गया है। किराया, बच्चों की पढ़ाई और राशन, सब कुछ महंगा हो गया है, लेकिन हमारी मजदूरी वही की वही है। – मोहम्मद दिलशाद, बुलंदशहर रोड फिरोज बिल्डिंग

बीमारी में कोई सहारा नहीं

दिहाड़ी कामगारों के लिए सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब वह बीमार पड़ जाते हैं। अगर एक दिन भी काम नहीं किया तो आमदनी बंद हो जाती है। बीमारी में न तो कोई सरकारी मदद मिलती है और न ही ठेकेदार साथ देता है। ऐसे में कर्ज लेकर इलाज कराना पड़ता है। – ओम सिंह, अमरोहा

बुजुर्ग मजदूरों की हालत और भी खराब

उम्र बढ़ने के साथ काम मिलना और भी मुश्किल हो गया है। अब ठेकेदार युवा मजदूरों को ज्यादा तरजीह देते हैं। हम लोग घंटों खड़े रहते हैं, लेकिन कोई पूछता भी नहीं। घर में जिम्मेदारियां अभी भी हैं, लेकिन काम के मौके कम हो गए हैं। – अवधेश कुमार, तगासराय

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