नीमडीह में बिजली गिरने से एक की मौत, दो गंभीर; कोल्हान की खनिज युक्त मिट्टी बन रही है बिजली का मैग्नेट

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 सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह थाना क्षेत्र अंतर्गत घुटियाडीह गांव में बुधवार सुबह वज्रपात (आसमानी बिजली) ने भारी तबाही मचाई। इस प्राकृतिक आपदा की चपेट में आने से एक 24 वर्षीय युवक की मौत हो गई, जबकि दो अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गए।

कैसे हुई घटना?

जानकारी के अनुसार, बुधवार सुबह गांव के विकास महतो (24), अमूल्य महतो (25) और हागरू महतो (62) शौच के लिए गांव के बाहर तालाब की ओर गए थे। इसी दौरान अचानक तेज हवाओं के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।
बारिश से बचने के लिए तीनों पास के एक पेड़ के नीचे शरण ली। तभी अचानक पेड़ पर जोरदार आसमानी बिजली गिरी, जिसकी चपेट में तीनों आ गए।

हादसे के बाद घायलों को ले गए अस्‍पताल

परिजन तत्काल विकास और हागरू को नीमडीह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने विकास महतो को मृत घोषित कर दिया। हागरू महतो को प्राथमिक उपचार के बाद बेहतर इलाज के लिए जमशेदपुर रेफर कर दिया गया। वहीं, गंभीर रूप से घायल अमूल्य महतो को परिजन सीधे जमशेदपुर ले गए, जहां उनका उपचार जारी है।

कोल्हान और पूर्वी सिंहभूम में ही क्यों गिरती है ज्यादा बिजली?

कोल्हान प्रमंडल (पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां) देश के उन क्षेत्रों में शामिल है जहां वज्रपात की घटनाएं सर्वाधिक होती हैं। इसके पीछे मुख्य भौगोलिक और वैज्ञानिक कारण निम्नलिखित हैं: 

  1.     लौह अयस्क और खनिज भंडार: विशेषज्ञों के अनुसार, इस क्षेत्र की मिट्टी और पहाड़ों में लौह अयस्क (Iron Ore) और अन्य धात्विक खनिजों की प्रचुरता है। ये खनिज विद्युत के सुचालक होते हैं, जो बादलों के बीच उत्पन्न होने वाले विद्युत आवेश (Charge) को अपनी ओर तेजी से आकर्षित करते हैं।
  2.     छोटा नागपुर पठार की स्थिति: कोल्हान का पठारी इलाका और घने जंगल बादलों के घर्षण के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करते हैं।
  3.     जलवायु परिवर्तन: बढ़ती गर्मी और नमी (Humidity) के कारण स्थानीय स्तर पर ‘थंडर क्लाउड्स’ का निर्माण अधिक होता है।

पांच वर्षों का डराने वाला आंकड़ा

आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले पांच वर्षों में कोल्हान प्रमंडल में ठनका गिरने से 250 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। अकेले पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला जिले में हर साल मानसून और प्री मानसून के दौरान 40 से 50 मौतें दर्ज की जाती हैं। इनमें अधिकांश घटनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में खुले मैदान या पेड़ों के नीचे शरण लेने के कारण होती हैं।

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