संस्कृत भाषा के पुनरुत्थान और वैश्विक प्रसार में अग्रणी संस्था संस्कृत भारती के नवनिर्मित केंद्रीय कार्यालय भवन ‘प्रणव’ का भव्य उद्घाटन सोमवार को किया गया।
राजधानी के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग स्थित इस अत्याधुनिक नौ मंजिला भवन का लोकार्पण करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डाॅ. मोहन भागवत ने कहा कि संस्कृत सबको आनी चाहिये। यह संस्कार लाती है।
भारत एक परंपरा है : डॉ. भागवत
उन्होंने बताया कि अक्षय तृतीया के दिन जो कार्य प्रारंभ होते हैं, वह अक्षुण्ण रहते हैं। यही बात संस्कृत के बारे में कहा गया है। कभी न क्षय होने वाला आभूषण संस्कृत है। उसका कार्यालय अपने आप में यह संदेश दे रहा है।
उन्होंने कहा कि कार्यालय के उद्घाटन में उसके आनंद उत्साह में कार्य का भाव भी स्थिर होना चाहिए। रुचि के साथ प्रयोजन भी हो तो कार्य अच्छा और निरंतर होता है। साधन नहीं अवस्था में कार्य आरम्भ होता है।
बाद में कीर्ति, धन साधन भी आते हैं लेकिन कार्य में निष्ठा तब आती है, जब प्रयोजन स्पष्ट हो। संस्कृत भारत का प्राण है। भारत का अस्तित्व केवल भूगोल नहीं, भारत एक परंपरा है। इसके आधार पर जीवन चलता है। उसकी आवश्यकता दुनिया में निरंतर रहती है।
भाषा सीखने का सबसे सरल उपाय संभाषण’
उन्होंने कहा कि भारत को जानना, मानना और स्वयं को भारत बनाना होगा, यह सब करने के लिए संस्कृत जानना होगा। भारत में कई तरह की भाषाएं हैं, उन्हें जोड़ने वाली भाषा संस्कृत है। संस्कृत जानते हैं तो कोई भाषा समझने में अच्छा। पृथ्वी के बिगड़े संतुलन को प्राप्त करना है तो संस्कृत आवश्यक है, लेकिन यह भाव अंदर से आए।
सरसंघचालक ने कहा कि संस्कृत भाषा ऐसी है, इसको उतारने से मन में भारत उतरता है, बड़े तत्व ज्ञान विभिन्न ग्रंथों के तब जान सकते हैं। संस्कृत भाषा भारत का प्राण है। बचपन में कठिनाई जो आई थी, संस्कृत सीखने में, वो व्याकरण। व्याकरण नहीं जानते, भाव जानता हूं।
उन्होंने अपने संबोधन में कहा भाषा सीखने का सबसे सरल उपाय संभाषण है। 15 वर्ष में संस्कृत को लेकर समाज में कई तरह के सुधार हुए। इसलिए निरंतर संभाषण शिविरों की चिंता हमें करनी चाहिए। संस्कृत सभी को समझना चाहिए। मन को रंजन करती है, ज्ञान को भी बढ़ाती है। समाज तक ले जाने वालों की कमी है। इसे विश्व में स्थापित करना है तो और काफी कुछ करना होगा।
‘अंग्रेजी बढ़ी तो बच्चे मातृभाषा में गिनती भूले’
डॉ. भागवत ने कहा कि भारत के सभी भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी संस्कृत है। इस भाषा का ठीक से प्रचार-प्रसार करना होगा। संस्कृत भाषा किसी को मिटाकर प्रतिस्थापन नहीं करती। संस्कृत भाषा सबके साथ चलती है। उसके उलट, अंग्रेजी भाषा बढ़ने पर घर के बच्चे मातृभाषा में गिनती करना भूल गए। संस्कृत, संस्कार, भावना लेकर आता है।
देश के विभिन्न प्रांतों से आए प्रतिनिधि
बता दें कि संस्कृत भारती के पदाधिकारियों के अनुसार, यह भवन आने वाले समय में संस्कृत के प्रचार-प्रसार, शोध व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके विस्तार के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है।
उद्घाटन समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई वरिष्ठ पदाधिकारी, देश के विभिन्न प्रांतों से आए प्रतिनिधि, शिक्षाविद् व संस्कृत प्रेमियों ने भाग लिया।
यह आयोजन संस्कृत के नवजागरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। इसमें दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, दिल्ली सरकार में मंत्री प्रवेश वर्मा समेत कई अन्य विशिष्ट जन सम्मिलित हुए।
वैदिक ऋचाओं के मध्य तीन दिवसीय अनुष्ठान संपन्न
उद्घाटन से पूर्व शनिवार को तीन दिवसीय वैदिक अनुष्ठान का विधिवत् शुभारंभ किया गया था। संपूर्ण परिसर वैदिक मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक वातावरण से गुंजायमान हो रहा था। देशभर से पधारे लगभग 100 विद्वान आचार्यों ने सामूहिक रूप से वेदपाठ किया।
आचार्य सुधीर, प्रो. रामराज उपाध्याय एवं प्रो. परमानंद भारद्वाज के सानिध्य में वास्तु पूजन, मंडल रचना, कलश स्थापना व नवग्रह शांति जैसे शास्त्रीय विधान सम्पन्न कराए जा रहे हैं।
संस्कृत का होगा वैश्विक विस्तार
प्रणव’ बनेगा संस्कृत के वैश्विक विस्तार का केंद्र संस्कृत भारती के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्रीशदेव पुजारी ने बताया कि ‘प्रणव’ कार्यालय भवन का निर्माण आधुनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया गया है, जिससे संगठन की गतिविधियों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।


