नस्लभेद की आग में तपकर बने वैज्ञानिक: कहानी पर्सी जूलियन की, जिन्होंने गरीबों के लिए सस्ता किया इलाज

क्या आपने कभी सोचा है कि आज जो जीवन रक्षक दवाएं हमें आसानी से मिल जाती हैं, उन्हें सस्ता और सुलभ बनाने के पीछे किसका हाथ है?

11 अप्रैल 1899 को जन्मे पर्सी लेवोन जूलियन एक ऐसे ही महान अफ्रीकी-अमेरिकी रसायनशास्त्री थे। उन्होंने अपने जीवनकाल (मृत्यु – 19 अप्रैल 1975) में विज्ञान के क्षेत्र में ऐसा चमत्कार किया, जिसने दवा उद्योग की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी और महंगी दवाओं को आम लोगों की पहुंच में ला दिया।

गरीबी और संघर्ष से भरा शुरुआती जीवन

पर्सी का बचपन बेहद संघर्षों से भरा था। उनका जन्म एक गरीब अफ्रीकी-अमेरिकी परिवार में हुआ था। उस दौर में उनके लिए शिक्षा पाना आसान नहीं था, लेकिन उनकी लगन पक्की थी। तमाम मुश्किलों के बावजूद उन्होंने ‘इंडियाना यूनिवर्सिटी’ से रसायन विज्ञान में अपनी बैचलर डिग्री पूरी की और फिर ‘हार्वर्ड यूनिवर्सिटी’ से मास्टर्स किया। अपने ही देश में जब उच्च शिक्षा और अवसरों के दरवाजे बंद होने लगे, तो उन्होंने हार नहीं मानी और रिसर्च के लिए यूरोप का रुख किया।

प्रयोगशाला में बनाई दवाएं, कम की लागत

उस समय चिकित्सा जगत की एक बड़ी समस्या यह थी कि कई जरूरी दवाएं केवल प्राकृतिक चीजों से ही निकाली जाती थीं। प्राकृतिक स्रोतों से इनकी मात्रा इतनी कम मिलती थी कि ये बेहद महंगी होती थीं। पर्सी ने इस मुश्किल को हल करते हुए अपनी प्रयोगशाला में वैज्ञानिक तरीकों से इन दवाओं को बनाना शुरू किया। उनके इस तरीके से दवाओं का बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन संभव हुआ और उनकी लागत तेजी से नीचे आ गई।

सोयाबीन से जुड़े अनोखे और जादुई प्रयोग

उनका सबसे अनोखा और क्रांतिकारी प्रयोग सोयाबीन के साथ था। पर्सी ने सोयाबीन से निकलने वाले ‘स्टेरॉल’ को आधार बनाकर रासायनिक प्रक्रियाओं के जरिए कई उपयोगी स्टेरॉयड हार्मोन तैयार किए। सिर्फ दवाएं ही नहीं, बल्कि उन्होंने सोयाबीन प्रोटीन से एक खास फायर-फाइटिंग फोम भी बनाया। इस फोम ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जहाजों पर लगने वाली भयानक आग को बुझाने में अहम भूमिका निभाई थी।

सिंथेटिक प्रोजेस्टेरोन का आविष्कार

चिकित्सा के क्षेत्र में पर्सी के दो और बड़े आविष्कार मील का पत्थर माने जाते हैं। पहला था ‘सिंथेटिक प्रोजेस्टेरोन’ का निर्माण। उन्होंने सोयाबीन और पौधों से मिलने वाले प्राकृतिक कच्चे पदार्थों का उपयोग करके लैब में प्रोजेस्टेरोन जैसे महत्वपूर्ण हार्मोन को बड़े पैमाने पर बनाया। आज इस हार्मोन का इस्तेमाल गर्भनिरोधक, महिलाओं के पीरियड्स को नियंत्रित करने और हार्मोनल उपचार में धड़ल्ले से किया जाता है।

आंखों की बीमारी का सस्ता इलाज

उनकी एक और सबसे बड़ी उपलब्धि ‘फिसोस्टिग्मीन’ का सफल निर्माण थी। यह दवा ग्लूकोमा जैसी आंखों की गंभीर बीमारी के इलाज में काम आती है। पहले यह दवा केवल प्राकृतिक रूप से बहुत कम मात्रा में मिलती थी और आम लोगों के लिए इसे खरीदना लगभग नामुमकिन था। पर्सी ने इसे अपनी प्रयोगशाला में तैयार करने की विधि खोजी, जिससे इसका उत्पादन बेहद सस्ता और आसान हो गया।

कदम-कदम पर झेला नस्लीय भेदभाव

हालांकि, पर्सी जूलियन की यह सफलता कांटों भरी थी। उन्हें कदम-कदम पर भयंकर नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा। पढ़ाई के दिनों में उन्हें त्वचा के रंग की वजह से बाकी छात्रों से अलग रखा जाता था। उन्हें कई बार नौकरियों से सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया या खारिज कर दिया गया क्योंकि वे अश्वेत थे। हद तो तब हो गई जब उन्होंने रहने के लिए अपना एक घर खरीदा; वहां भी उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया और उनके घर पर हिंसक हमले भी हुए।

देर से मिला सम्मान, लेकिन नहीं हारी हिम्मत

लंबे समय तक उनके शानदार काम को नजरअंदाज किया गया और शुरुआती वर्षों में उन्हें वह पहचान नहीं मिली जिसके वे असली हकदार थे। इन सब के बावजूद, पर्सी लेवोन जूलियन ने कभी हिम्मत नहीं हारी। वे पूरी लगन से अपने शोध में जुटे रहे। उनके इसी अटूट समर्पण और कड़ी मेहनत ने आखिरकार समाज को झुकने पर मजबूर कर दिया और अंततः उन्हें विज्ञान तथा उद्योग के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान प्राप्त हुआ, जो उनकी महानता का सच्चा प्रमाण है।

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