गोरखपुर में खतरा बने सूखे पेड़, विभाग कर रहा हादसे का इंतजार

जिले में सड़क किनारे खड़े सूखे और जर्जर पेड़ लगातार हादसों को न्योता दे रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार विभाग अब भी उदासीन बना हुआ है। बुधवार को पूर्वोत्तर रेलवे महाप्रबंधक कार्यालय के समीप कटहल का पेड़ गिरने से शाहपुर क्षेत्र के जंगल तुलसीराम बिछिया, हनुमान मंदिर निवासी जितेंद्र शुक्ला की मौत हो गई, जबकि उनके साथी प्रमोद पाल गंभीर रूप से घायल हो गए। दोनों बाइक से घर लौट रहे थे, तभी अचानक पेड़ उनके ऊपर गिर पड़ा।

गुरुवार को गोलघर पुलिस चौकी के पीछे खड़े वाहनों पर भी एक पेड़ गिर गया। गनीमत रही कि उस समय कोई वाहन में मौजूद नहीं था, जिससे जनहानि टल गई, हालांकि वाहनों को नुकसान पहुंचा। इसके बाद पुलिस ने संबंधित विभाग को सूचना देकर पेड़ की कटान कराकर मौके से हटवाया।

ये घटनाएं केवल उदाहरण हैं। जिले के विभिन्न मार्गों पर वर्षों से सूखे पेड़ खड़े हैं, जो कभी भी गिरकर बड़ा हादसा कर सकते हैं। सिहोरवा-जंगल कौड़िया मार्ग पर बनौली गांव के पास शराब की दुकानों के सामने एक पेड़ करीब एक वर्ष से सूखा खड़ा है।

विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ेंस्थानीय लोगों का कहना है कि तेज हवा में यह कभी भी गिर सकता है। गोला से कौड़ीराम मार्ग पर जानीपुर बाजार तक लगभग 46 पेड़ सूख चुके हैं। बड़हलगंज से गोरखपुर और पटना घाट होते हुए बरहज-देवरिया जाने वाले राम-जानकी मार्ग पर भी सड़क चौड़ीकरण के दौरान अधिकांश पेड़ काट दिए गए हैं, जबकि बचे हुए दर्जनों पेड़ सूख चुके हैं और सड़क किनारे खड़े हैं।

बेलघाट-सिकरीगंज मार्ग, मझगवां मार्ग और कूरी से सिकरीगंज के बीच 25 से 30 पेड़ सूखकर जर्जर हालत में खड़े हैं। सहजनवा तहसील क्षेत्र, गीडा सेक्टर-26, भीटी रावत में शराब भट्ठी के सामने, चकिया तिराहा से कसरवल अंडर ब्रिज से मगहर जाने वाले रास्ते में करीब आधा दर्जन सूखे पेड़ खड़े है।

चकिया के पास फोरलेन पर भी एक पेड़ सूखकर खड़ा है। सिकरीगंज के ढेबरा चौराहा पर एक पेड़ सूखा हुआ है। इसके नीचे चलने वाली दुकानों पर गिरने से हादसा हो सकता है। गगहा-गजपुर मार्ग समेत कई स्थानों पर सूखे पेड़ खतरा बने हुए हैं। गगहा क्षेत्र के हाटा-असवनपार लिंक मार्ग पर वर्षों से खड़ा सूखा पेड़ भी दुर्घटना को दावत दे रहा है।

इसी तरह से अन्य मार्गों पर भी सूखे और जर्जर पेड़ खड़े है। जब कभी स्थानीय लोग वन विभाग में पेड़ की कटान कराने के लिए कहते है तो विभाग नियमों का हवाला देता, वन निगम को कटान कराने की जिम्मेदारी की बात कहता। हालांकि सवाल यह है कि अनुमति की प्रक्रिया पूरी होने तक कितने और हादसे होंगे।

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