पश्चिमी चंपारण में गहराया गैस संकट: होटलों में लकड़ी-इलेक्ट्रिक चूल्हे पर पक रहा खाना, प्रशासन के दावे फेल

 नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में रसोई गैस की किल्लत अब विकराल रूप ले चुकी है। प्रशासन के तमाम दावे जमीनी हकीकत के आगे पूरी तरह फेल नजर आ रहे हैं। हालत यह है कि होटल, ढाबे और चाय दुकान चलाने वाले गैस के अभाव में लकड़ी और इलेक्ट्रिक चूल्हों का सहारा लेने को मजबूर हैं।

बताया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान-इजरायल तनाव के कारण आपूर्ति प्रभावित हुई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाओं की लचर स्थिति ने संकट को और गहरा दिया है। गैस एजेंसियों पर रोजाना लंबी कतारें लग रही हैं। बुधवार को भी दर्जनों लोग खाली सिलेंडर लेकर तेज धूप में घंटों लाइन में खड़े रहे, लेकिन कई को निराश होकर लौटना पड़ा।

छोटे व्यापारियों पर सबसे ज्यादा असर

सबसे ज्यादा असर छोटे व्यवसायियों पर पड़ा है। होटल संचालकों का कहना है कि लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने में समय दोगुना लग रहा है और खर्च भी बढ़ गया है। वहीं इलेक्ट्रिक चूल्हे पर निर्भरता बढ़ने से बिजली बिल अलग से झटका दे रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि गैस पर बनने वाले खाने जैसा स्वाद और तेजी दोनों ही गायब हो गए हैं, जिससे ग्राहकों को इंतजार करना पड़ रहा है और व्यवसाय प्रभावित हो रहा है।

होम डिलीवरी के दावे साबित हो रहे खोखले

दूसरी ओर, प्रशासन द्वारा की जा रही होम डिलीवरी के दावे भी पूरी तरह खोखले साबित हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि समय पर गैस की आपूर्ति नहीं हो रही, जिससे रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो रही है।

गुस्साए उपभोक्ताओं का साफ कहना है कि अगर जल्द ही व्यवस्था नहीं सुधरी तो हालात और बिगड़ सकते हैं। फिलहाल, गैस संकट ने प्रशासनिक तैयारियों और दावों की सच्चाई उजागर कर दी है।

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