जम्मू पुलिस को ऑपरेशन अवतार में मिली बड़ी जीत, अंतरराज्यीय वाहन चोर गिरोह का भंडाफोड़, 40 लाख की गाड़ियां बरामद

 दक्षिण जोन की जम्मू पुलिस ने वाहन चोरी के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान आपरेशन अवतार के तहत एक और बड़ी सफलता हासिल की है।

पिछले महीने 16 चोरी की दोपहिया वाहन बरामद करने के बाद अब पुलिस ने एक कुख्यात अंतरराज्यीय वाहन चोर गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए उसके सरगना समेत दो आरोपितों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने करीब 40 लाख रुपये कीमत की चार हाई-एंड गाड़ियां भी बरामद की हैं।

एसपी सिटी साउथ अजय शर्मा ने बताया कि मुख्य आरोपित की पहचान पवन कुमार पुत्र कमल सिंह निवासी वीरान, तोशाम, जिला भिवानी (हरियाणा) के रूप में हुई है। उसके साथ राकेश सिंह पुत्र अंचल सिंह निवासी दीना नगर, सेंट जेवियर कान्वेंट स्कूल के पास, बरनाई, जम्मू को भी गिरफ्तार किया गया है।जांच में सामने आया है कि पवन कुमार विभिन्न राज्यों में दर्ज करीब 70 वाहन चोरी के मामलों में नामजद है। प्रारंभिक खुफिया जानकारी के अनुसार गिरोह पिछले 7-8 वर्षों में लगभग 1000 वाहनों की चोरी में संलिप्त हो सकता है।
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उत्तर भारत में फैला नेटवर्क
गंग्याल थाना प्रभारी इंस्पेक्टर संजीव चिब की निगरानी में गठित विशेष टीम तकनीकी विश्लेषण और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपितों की गतिविधियों को ट्रैक किया। पुलिस ने उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में छापेमारी कर गिरोह के सदस्यों की पहचान की और चोरी के वाहनों की आवाजाही का पता लगाया। गिरोह विशेष रूप से महंगी और लोकप्रिय गाड़ियों को निशाना बनाता था। इनमें महिंद्रा स्कार्पियो, मारुति स्विफ्ट, हुंडई आई-20 और शेवरले बीट जैसी गाड़ियां शामिल थीं।
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ऐसे देते थे वारदात को अंजाम
अंतरराज्यीय वाहन चोर गिरोह बेहद संगठित और तकनीकी तरीके से वारदात को अंजाम देता था। गिरोह के सदस्य पहले उन इलाकों की रेकी करते थे जहां हाई-एंड और लोकप्रिय गाड़ियां नियमित रूप से खड़ी रहती थीं। इसके बाद मास्टर चाबी और आधुनिक उपकरणों की मदद से कुछ ही मिनटों में वाहन चोरी कर लिया जाता था। चोरी के तुरंत बाद वाहन को दूसरे राज्य में पहुंचा दिया जाता था ताकि स्थानीय पुलिस की पकड़ से बाहर रहा जा सके। गिरोह वाहन की पहचान मिटाने के लिए नंबर प्लेट बदल देता था और चेसिस व इंजन नंबर में भी तकनीकी छेड़छाड़ करता था। कई मामलों में फर्जी दस्तावेज तैयार कर वाहन को कम कीमत पर बेच दिया जाता था। अलग-अलग राज्यों में फैले नेटवर्क के जरिए ये चोरी की गाड़ियां नए खरीदारों तक पहुंचाई जाती थीं। इसी सुनियोजित तरीके से गिरोह वर्षों से सक्रिय था और पुलिस की नजर से बचता रहा।

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