नीयत साफ हो और हौसले बुलंद तो समाज की कुरीतियां खुद-ब-खुद दम तोड़ने लगती हैं। इसी का उदाहरण हैं तीन बहनों समेत चार बेटियों का बिना दहेज ससुराल की दहलीज पार करना। दूल्हों ने भी नई सोच का परिचय देते हुए दहेज लेने से इनकार किया और स्पष्ट तौर पर कहा कि दुल्हन चाहिए-पैसा नहीं।
गांव ठड्यों में एक ही परिवार की तीन बेटियों-हरप्रीत, अंशुल और परमजीत की शादी बिना किसी दहेज के संपन्न हुई। हरप्रीत की बरात यमुनानगर के गांव शालापुर से आई थी, जबकि अंशुल और परमजीत के जीवनसाथी अंबाला के लालपुर से आए थे।
दूल्हे पक्ष के लोगों ने स्पष्ट किया कि वे बेटी को लक्ष्मी मानकर अपने घर ले जा रहे हैं। गांव ककराली में सौरभ राणा ने पारंपरिक शगुन के रूप में 5 लाख रुपये लेने से इनकार कर दिया।
अब पंचकूला जिले के रायपुररानी क्षेत्र में दो अलग-अलग गांवों में हुई ये शादियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं। बेटियों का बिना किसी दहेज के बोझ के अपने नए घर की ओर बढ़ीं तो समाज की पुरानी सोच पीछे छूट गई।
दूल्हों ने लाखों का शगुन ठुकरा कर इस बात का प्रमाण दिया कि नई पीढ़ी अब नारी के स्वाभिमान को धन-दौलत से ऊपर तौल रही है। क्षेत्र में इस नेक पहल की गूंज केवल एक दिन की चर्चा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणापुंज बनेगी।


