दिसंबर 2001 में संसद पर हुए आतंकवादी हमले के बाद शुरू हुआ ‘ऑपरेशन पराक्रम’ में भारतीय सेना ने 1971 के बाद से सबसे बड़ी सैन्य तैनाती की थी। भारी सैन्य तैनाती और संसाधनों के खर्च के बावजूद, तात्कालिक राजनीतिक परिणामों की कमी ने सेना को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
इसी संस्थागत निराशा से ‘कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन’ का जन्म हुआ, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ 48 से 72 घंटों के भीतर त्वरित और सीमित सैन्य कार्रवाई करना था। हालांकि, हाल ही में आतंकवादियों के खिलाफ हुए ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों ने इस रणनीति को एक नए आयाम पर पहुंचा दिया है।
अब भारतीय सेना अपनी पुरानी कमियों—जैसे इंटर-सर्विस एकीकरण की कमी और राजनीतिक अनुमोदन का अभाव को दूर करते हुए इसे ‘कोल्ड स्ट्राइक’ में बदलने की तैयारी कर रही है। ऑपरेशन सिंदूर के तुरंत बाद , सेना के उच्च अधिकारियों ने विभिन्न मंचों पर अपनी ‘कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन’ को और मजबूत करने और इसे ‘कोल्ड स्ट्राइक’ नाम देने का इरादा जाहिर किया है।
क्या है कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन ?
कोल्ड स्टार्ट डॉक्ट्रिन भारतीय सेना की एक त्वरित और आक्रामक युद्ध नीति है, इसे पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद के जवाब में विकसित किया गया है। इस रणनीति के तहत, भारतीय सेना के ‘एकीकृत युद्ध समूह’ दुश्मन के क्षेत्र में 48-72 घंटों के भीतर प्रवेश कर, बिना पूर्ण परमाणु युद्ध को उकसाए सीमित, निर्णायक और तीव्र हमला करने में सक्षम हैं।
यह डॉक्ट्रिन, ऑपरेशन पराक्रम के अधूरे मकसद से बनी थी, जिसका मकसद पाकिस्तान के स्पॉन्सर्ड हमलों का तेजी से, सीमित अटैकिंग जवाब देना था।
कोल्ड स्टार्ट को लगभग पूरी तरह से एक सैन्य अभ्यास के रूप में विकसित किया गया था। भारतीय वायु सेना और नौसेना इसकी रचना में गंभीरता से शामिल नहीं थीं, और शायद इस अवधारणा को सीसीएस के समक्ष जांच और अनुमोदन के लिए प्रस्तुत भी नहीं किया गया था।


