सिंगरौली। वैढ़न मुख्यालय के गनियारी स्थित कचरा प्रबंधन प्लांट को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। नगर पालिक निगम सिंगरौली के अंतर्गत कचरा प्रबंधन का कार्य कर रही सिटाडेल आईएसडब्ल्यूएम प्रोजेक्ट सिंगरौली प्राइवेट लिमिटेड पर जहां रिहायशी इलाके में प्लांट संचालित करने के आरोप हैं, वहीं अब अनुमति देने वाली एजेंसियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक लोगों ने मांग उठाई है कि यह स्पष्ट किया जाए कि प्लांट को किन नियमों और शर्तों के तहत स्वीकृति दी गई।

रिहायशी क्षेत्र में प्लांट: क्या नियमों का पालन हुआ?
गनियारी एक आबादी वाला क्षेत्र है। ऐसे में यहां ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्लांट की स्थापना को लेकर लोगों में आक्रोश है। आमतौर पर कचरा प्रसंस्करण इकाइयों को शहर से दूर या निर्धारित औद्योगिक क्षेत्रों में स्थापित करने की अनुशंसा की जाती है, ताकि दुर्गंध, प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों से आमजन को बचाया जा सके। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि यह प्लांट पर्यावरणीय और नगरीय नियोजन मानकों के अनुरूप स्थापित हुआ है, तो उसकी अनुमति और प्रक्रिया सार्वजनिक की जानी चाहिए।
मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका पर प्रश्न
अब इस मामले में मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका भी चर्चा में है। स्थानीय लोगों का सवाल है कि बोर्ड ने किस नियम और किस आधार पर इस प्लांट को ‘कंसेंट टू एस्टैब्लिश’ (स्थापना की अनुमति) और ‘कंसेंट टू ऑपरेट’ (संचालन की अनुमति) प्रदान की।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित परियोजनाओं के लिए आमतौर पर निम्न प्रक्रियाएं अनिवार्य मानी जाती हैं:
- स्थल चयन की स्वीकृति
- पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन
- प्रदूषण नियंत्रण उपायों की विस्तृत योजना
- लीचेट और दुर्गंध नियंत्रण व्यवस्था
- आसपास हरित पट्टी का विकास
- स्थानीय निकाय की अनुशंसा
यदि यह प्लांट रिहायशी क्षेत्र में संचालित हो रहा है, तो क्या इन सभी शर्तों का पालन किया गया? क्या निरीक्षण रिपोर्ट तैयार हुई? क्या नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर अब तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं, जिससे संदेह और गहरा गया है।
दुर्गंध, प्रदूषण और स्वास्थ्य पर प्रभाव
गनियारी के निवासियों का आरोप है कि प्लांट से उठने वाली बदबू और कचरे के ढेर से निकलने वाला प्रदूषित पानी वातावरण को दूषित कर रहा है। बारिश के मौसम में हालात और गंभीर हो जाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक ऐसे वातावरण में रहने से श्वसन संबंधी रोग, त्वचा संक्रमण और जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। नागरिकों का कहना है कि जनस्वास्थ्य की अनदेखी कर केवल ठेके और लागत पर ध्यान देना गंभीर लापरवाही है।
आर्थिक पहलू भी चर्चा में
सूत्रों के अनुसार, यदि कचरा प्लांट शहर से दूर स्थापित होता तो कंपनी को परिवहन और संचालन में अधिक खर्च उठाना पड़ता। वर्तमान स्थान नगर निगम क्षेत्र में ही होने के कारण कंपनी को लागत में राहत मिलती है। नागरिकों का आरोप है कि लागत बचाने के लिए रिहायशी क्षेत्र का चयन किया गया, जो जनहित के विपरीत है।

पारदर्शिता और जांच की मांग
- नगर निगम द्वारा दी गई अनुमति की शर्तें सार्वजनिक की जाएं।
- मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी स्वीकृतियों की प्रतियां सार्वजनिक की जाएं।
- प्लांट की स्वतंत्र पर्यावरणीय जांच कराई जाए।
- यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाए तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
आगे क्या?
गनियारी कचरा प्लांट का मामला अब केवल स्थानीय असुविधा का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही का प्रश्न बन चुका है।
अब निगाहें नगर पालिक निगम सिंगरौली और मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर टिकी हैं कि वे इस विवाद पर क्या रुख अपनाते हैं क्या जांच होगी, क्या अनुमति प्रक्रिया सार्वजनिक की जाएगी, या फिर जनआक्रोश और बढ़ेगा।


