सीडीएस अनिल चौहान ने युवाओं से किया संवाद, चाणक्य नीति व आत्मनिर्भर रणनीति पर दिया जोर

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 गढ़वाल विश्वविद्यालय के चौरास परिसर में आयोजित कार्यक्रम में अनिल चौहान ने राष्ट्रीय सुरक्षा विषय पर छात्र-छात्राओं से विस्तृत संवाद किया। अपने संबोधन में उन्होंने प्राचीन भारतीय सामरिक परंपरा, चाणक्य नीति और आधुनिक युद्ध रणनीति पर विशेष प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिए समाज के सभी वर्गों की भागीदारी आवश्यक है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में सामरिक शोध की कमी रही है, लेकिन उनका ऐसा मानना नहीं है। उन्होंने कहा कि पौराणिक काल से ही भारत में सामरिक चिंतन और शोध होते आए हैं। धनुर्वेद में व्यूह रचना, धनुर्विद्या और सेना संचालन का विस्तृत वर्णन मिलता है। वहीं अर्थशास्त्र और चाणक्य नीति में राज्य संरक्षण, शक्ति संतुलन और कूटनीतिक सोच का स्पष्ट उल्लेख है। उन्होंने कहा कि चाणक्य की रणनीतिक दृष्टि की झलक आज भी भारत की विदेश नीति में दिखाई देती है।

सीडीएस ने कहा कि मुगल काल के दौरान लगभग 800 वर्षों में भारत की सामरिक सोच कमजोर हुई। 1947 में देश भौतिक रूप से स्वतंत्र हुआ, लेकिन मानसिक स्वतंत्रता प्राप्त करने में समय लगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि मौलिक (ओरिजिनल) सोच अत्यंत आवश्यक है। पश्चिमी सोच पर आधारित रणनीतियों से पूर्ण सफलता पाना कठिन है; यदि हथियार, युद्ध नीति और रणनीति मौलिक हों तो सफलता सुनिश्चित होती है।

उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के तीन महत्वपूर्ण घेरों की चर्चा की। पहला बाहरी घेरा दीर्घकालीन आकलन और रणनीतिक दृष्टि से जुड़ा है, जिसमें कूटनीति, अर्थव्यवस्था और तकनीक शामिल हैं। दूसरा मध्य घेरा राष्ट्र की रक्षा व्यवस्था से संबंधित है। तीसरा आंतरिक घेरा आत्मनिर्भरता, सेनाओं की संरचना और युद्ध योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़ा है।

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