‘हमें बताएं आप क्या नया कानून लाना चाहते हैं?’ ट्रिब्यूनल सुधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा पूरा प्लान

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देश में अर्ध-न्यायिक निकायों की गिरती स्थिति और कार्यप्रणाली पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं।

चीफ जस्टिस (सीजेआइ) सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने केंद्र से कहा कि वह देश भर के सभी न्यायाधिकरणों के प्रबंधन के लिए चार सप्ताह के भीतर एक व्यापक और समान प्रस्ताव पेश करे।

संस्थानों की स्वायत्तता व ढांचागत संकट पीठ मद्रास बार एसोसिएशन के लंबे समय से लंबित मामले की सुनवाई कर रही थी। यह मामला न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता और संरचनात्मक अखंडता पर केंद्रित था। पीठ ने रिक्तियों के संकट और एक सुव्यवस्थित विधायी ढांचे की कमी पर चिंता जताई, जिसके कारण कई न्यायाधिकरण वर्तमान में अधर में लटके हुए हैं।

हमें बताएं कि क्या आप नया कानून लाना चाहते हैं?

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से कहा कि सरकार को पिछले न्यायिक आदेशों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। सीजेआइ ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ”संस्थानों को निष्क्रिय न होने दें। हमारे सामने एक ऐसा समग्र प्रस्ताव लाएं जो सभी न्यायाधिकरणों को कवर करता हो। हमें बताएं कि क्या आप नया कानून लाना चाहते हैं या मौजूदा कानूनों में व्यापक संशोधन करना चाहते हैं।”

तत्काल समाधान के लिए अंतरिम निर्देश सुनवाई के दौरान अटार्नी जनरल ने रिक्तियों को तत्काल भरने और कामकाज को सुचारू बनाए रखने के लिए एक व्यावहारिक दृष्टिकोण का सुझाव दिया। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि वर्तमान अध्यक्षों को तब तक सेवा में बने रहने की अनुमति दी जाए जब तक वे सेवानिवृत्ति की आयु तक नहीं पहुंच जाते या नई चयन प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती।

कोर्ट ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए वित्तीय न्यायाधिकरणों को चालू रखने के लिए अंतरिम आदेश पारित किए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जस्टिस राजेश खरे ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (डीआरएटी) के अध्यक्ष के पद पर अगले आदेश तक बने रहेंगे। इसी तरह, कोलकाता डीआरएटी के अध्यक्ष को भी सेवा विस्तार दिया गया है ताकि संस्थान को निष्कि्रय होने से बचाया जा सके।

पुराने कानूनों पर कोर्ट का सख्त रुख

यह मामला नवंबर 2021 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ‘ट्रिब्यूनल रिफा‌र्म्स कानून 2021’ के उन प्रमुख प्रविधानों को रद कर दिया था, जो नियुक्तियों और सेवा शर्तों से संबंधित थे। कोर्ट ने तब स्पष्ट किया था कि ”संसद केवल मामूली बदलावों के साथ पुराने निर्णयों को फिर से लागू करके न्यायिक फैसलों को दरकिनार नहीं कर सकती।”

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