मोहिंदर सिंह रंधावा: जिन्हें मिली ‘पंजाब की छठी नदी’ की उपाधि, हरित क्रांति से पहले बदली भारत की तस्वीर

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“शहर सिर्फ इमारतों से नहीं, पेड़ों और फूलों से जीवित होता है।” यह विचार था मोहिंदर सिंह रंधावा का, एक ऐसे प्रशासनिक अधिकारी जिन्होंने अपनी वैज्ञानिक सोच और प्रकृति प्रेम से आधुनिक भारत की तस्वीर बदल दी।

20वीं सदी के इस महान प्रशासक ने भारत में हरित क्रांति आने से पहले ही कई ऐसे कृषि बदलाव किए, जिसके कारण इन्हें पंजाब की छठी नदी की उपाधि भी दी गई। अब आप सोच रहे होंगे कि आज हम अचानक से इनके बारे में क्यों बात कर रहे हैं। दरअसल, आज ही के दिन यानी 2 फरवरी 1909 में इनका जन्म हुआ था। इसी मौके पर चलिए जानते हैं इनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें।

शिक्षा और वैज्ञानिक पृष्ठभूमि

पंजाब के जीरा गांव में जन्मे मोहिंदर सिंह रंधावा का बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता। एक किसान परिवार से होने के कारण मिट्टी और खेती से उनका जुड़ाव स्वाभाविक था। उन्होंने लाहौर से बॉटनी में एमएससी की शिक्षा हासिल की, जिसने उनकी वैज्ञानिक सोच को विकसित किया। 1934 में उन्होंने लंदन से भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास की और करीब 9 वर्षों तक कलेक्टर के पद पर अपनी सेवाएं दीं।

विभाजन के समय पुनर्वास में ऐतिहासिक भूमिका

1947 में जब देश का विभाजन हुआ, तब रंधावा दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर थे। 15 अगस्त को लाल किले पर स्वतंत्रता समारोह की व्यवस्था से लेकर कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक में उन्होंने अहम भूमिका निभाई। 1948-49 में उन्हें पुनर्वास महानिदेशक बनाया गया। पश्चिमी पंजाब से आए लाखों शरणार्थियों को पूर्वी पंजाब में बसाना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन रंधावा ने न केवल उन्हें घर और जमीन दिलाई, बल्कि बीज, खाद और रोजगार की व्यवस्था कर उन्हें दोबारा पैरों पर खड़ा किया। उनके इन निस्वार्थ प्रयासों के कारण उन्हें ‘पंजाब की छठी नदी’ के नाम से पुकारा गया।

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