नई दिल्ली: केंद्र और राज्य सरकारों ने पिछले वर्षों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं। इसके बावजूद, स्कूली शिक्षा में ड्रॉपआउट को समाप्त करना और उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) बढ़ाना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में इस बात पर चिंता जताई गई है कि मौजूदा समय में ड्रॉपआउट की दर प्राथमिक स्तर पर 1.9 प्रतिशत, उच्च प्राथमिक स्तर पर 5.2 प्रतिशत और माध्यमिक स्तर पर 14.1 प्रतिशत है। वहीं, उच्च शिक्षा का जीईआर लगभग 28 प्रतिशत ही है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यह चिंता इसलिए गंभीर है क्योंकि 2030 तक स्कूली शिक्षा में सभी स्तरों पर जीईआर को शत-प्रतिशत और उच्च शिक्षा में 2035 तक इसे 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
सर्वेक्षण में कहा गया है कि शिक्षा के क्षेत्र में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वर्तमान में रफ्तार और प्रयास बढ़ाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों को स्कूलों और कॉलेजों में बनाए रखने के लिए नीतियों को और अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है।
विशेष रूप से उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ाने के लिए सरकारी और निजी संस्थानों के बीच सहयोग, छात्रवृत्ति योजनाओं का विस्तार और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, शिक्षा में डिजिटल और दूरस्थ सीखने के विकल्पों को अपनाकर छात्रों को स्कूल छोड़ने से रोकने में मदद मिल सकती है।
आर्थिक सर्वेक्षण ने यह भी रेखांकित किया कि शिक्षा के क्षेत्र में सुधार केवल अकादमिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके सामाजिक और आर्थिक लाभ भी सुनिश्चित होने चाहिए। उच्च शिक्षा में जीईआर बढ़ने से न केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि देश की मानव पूंजी और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता भी मजबूत होगी।


