उत्तर प्रदेश में सरकारी धान खरीद व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच में सामने आया है कि भूमिहीन व्यक्तियों के नाम पर बड़े पैमाने पर धान खरीद दिखाई जा रही है। यह खेल तहसील स्तर से शुरू होकर केंद्रों तक फैला हुआ है। पंजीयन नियमों की खुलेआम अनदेखी करते हुए भूमिहीन किसानों के अभिलेखों का सत्यापन किया जा रहा है।
जांच रिपोर्ट के अनुसार, जिन व्यक्तियों के पास कृषि योग्य भूमि तक नहीं है, उनकी फर्जी खतौनी बनाकर पंजीयन कराया गया। लेखपालों ने बिना स्थलीय जांच किए इन फर्जी अभिलेखों को सत्यापित कर दिया। थोड़े से लालच और सांठ-गांठ के चलते मिलर्स और केंद्र प्रभारियों ने इन फर्जी किसानों के नाम पर धान की खरीद कर ली।
फर्जी पंजीयन का खेल पिछले दिनों शाहाबाद क्षेत्र में 450 फर्जी किसानों से धान खरीद का मामला सामने आया था। अब जांच में यह संख्या और भी चौंकाने वाली निकली है। शाहाबाद और संडीला तहसील क्षेत्र के 11 गांवों में 1380 भूमिहीन किसानों से 1,50,061 क्विंटल धान की खरीद दर्शाई गई है। यह आंकड़ा सरकारी खरीद व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
कैसे हुआ घोटाला?
- भूमिहीन व्यक्तियों के नाम पर फर्जी खतौनी तैयार की गई।
- लेखपालों ने बिना स्थलीय जांच किए इन अभिलेखों को सत्यापित कर दिया।
- मिलर्स और केंद्र प्रभारियों ने सांठ-गांठ कर इन फर्जी पंजीकरणों के आधार पर धान की खरीद दिखाई।
- सरकारी रिकॉर्ड में यह धान खरीद वैध दिखती है, जबकि वास्तविकता में भूमिहीन व्यक्ति धान उत्पादन करने में सक्षम ही नहीं हैं।
प्रशासनिक लापरवाही और मिलीभगत इस पूरे मामले में प्रशासनिक लापरवाही साफ झलकती है। तहसील स्तर पर पंजीयन की प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई। लेखपालों ने स्थलीय सत्यापन किए बिना ही फर्जी अभिलेखों को मान्यता दी। वहीं मिलर्स और केंद्र प्रभारियों ने इस स्थिति का फायदा उठाकर सरकारी खरीद में धान की बिक्री कर दी।
आर्थिक नुकसान और किसानों पर असर इस तरह की फर्जी खरीद से न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि वास्तविक किसानों का हक भी मारा जा रहा है। जिन किसानों ने मेहनत से धान उत्पादन किया, उन्हें उचित मूल्य और खरीद का लाभ नहीं मिल पा रहा। फर्जी पंजीकरण के चलते असली किसानों को अपनी उपज बेचने में कठिनाई हो रही है।
जांच और कार्रवाई की मांग स्थानीय स्तर पर इस घोटाले की खबर फैलते ही किसानों में आक्रोश है। किसान संगठनों ने मांग की है कि इस मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही पंजीयन और सत्यापन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में इस तरह की धांधली न हो सके।
निष्कर्ष सरकारी धान खरीद में सामने आया यह घोटाला कृषि व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। भूमिहीन व्यक्तियों के नाम पर धान खरीद दिखाना न केवल भ्रष्टाचार का उदाहरण है, बल्कि किसानों के अधिकारों का हनन भी है। यदि समय रहते इस पर कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह समस्या और भी बड़े स्तर पर सामने आ सकती है।


