जनजातीय क्षेत्र जौनसार बावर में शादियों के दौरान बढ़ती फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाने के लिए ग्रामीणों ने पहल शुरू की है। इसी क्रम में हाल ही में हुई एक बैठक में यह प्रस्ताव रखा गया कि महिलाओं द्वारा शादी में पहने जाने वाले गहनों की संख्या सीमित की जाए। ग्रामीणों का मानना है कि ऐसा करने से समाज में दिखावे की प्रवृत्ति कम होगी और आर्थिक बोझ भी घटेगा।
बैठक में लिया गया निर्णय
ग्रामीणों की बैठक में यह विचार सामने आया कि शादियों में गहनों का अत्यधिक प्रदर्शन न केवल सामाजिक असमानता को बढ़ावा देता है, बल्कि परिवारों पर आर्थिक दबाव भी डालता है। इसीलिए महिलाओं के गहनों की संख्या सीमित करने का प्रस्ताव रखा गया। समर्थकों का कहना है कि इस कदम से समाजहित में फिजूलखर्ची पर रोक लगेगी और गरीब परिवार भी बिना दबाव के शादी कर सकेंगे।
महिलाओं का विरोध
हालांकि, इस प्रस्ताव का विरोध भी शुरू हो गया है। कई महिलाएं इसे असमानता और भेदभाव मान रही हैं। उनका कहना है कि यदि समाज में फिजूलखर्ची रोकनी है तो केवल महिलाओं पर ही पाबंदी क्यों लगाई जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि पुरुषों की ओर से होने वाली फिजूलखर्ची—जैसे महंगी शराब पर खर्च—पर कोई रोक क्यों नहीं लगाई जा रही।
असमानता का आरोप
महिलाओं का तर्क है कि इस तरह का निर्णय महिलाओं पर असमानता थोपता है। उनका कहना है कि गहनों को सीमित करने का प्रस्ताव महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों पर सीधा हस्तक्षेप है। यदि समाज में सुधार करना है तो पुरुषों की आदतों और खर्चों पर भी समान रूप से रोक लगनी चाहिए।
सामाजिक दृष्टिकोण
ग्रामीणों के बीच इस मुद्दे पर दो तरह की राय बन गई है। एक पक्ष का कहना है कि शादी में दिखावे और खर्च को कम करना जरूरी है, ताकि समाज में संतुलन बना रहे। वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि सुधार केवल महिलाओं पर पाबंदी लगाकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए पुरुषों की आदतों और खर्चों पर भी ध्यान देना होगा।
निष्कर्ष
जौनसार बावर में शादी खर्च पर रोक लगाने की पहल ने समाज में नई बहस छेड़ दी है। जहां कुछ लोग इसे समाजहित में जरूरी कदम मान रहे हैं, वहीं महिलाएं इसे असमानता और भेदभाव बता रही हैं। अब देखना होगा कि ग्रामीण समाज इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय कैसे लेता है और क्या इसमें पुरुषों की फिजूलखर्ची पर भी रोक लगाने का प्रावधान शामिल किया जाता है।


