भारत में आवारा कुत्तों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। यह केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि अब एक गंभीर सामाजिक और कानूनी समस्या के रूप में सामने आ रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए निर्देश जारी किए, जिसके बाद यह बहस और गरम हो गई है।
दरअसल, आवारा कुत्तों को लेकर समाज में दो तरह की सोच देखने को मिलती है।
- एक पक्ष के लिए ये कुत्ते पड़ोस के परिचित चेहरे होते हैं, जिनकी पूंछें लहराती रहती हैं और जो सुरक्षा का एहसास दिलाते हैं।
- दूसरे पक्ष के लिए ये चिंता का कारण हैं, क्योंकि ये रिहायशी इलाकों के पास मंडराते रहते हैं, संकरी गलियों को अवरुद्ध कर देते हैं और बच्चों के खेलने या लोगों के बाहर निकलने जैसी सामान्य दिनचर्या को तनावपूर्ण बना देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि प्रशासन और समाज किस तरह संतुलन बनाए, ताकि न तो सार्वजनिक सुरक्षा प्रभावित हो और न ही पशु अधिकारों की अनदेखी हो।


