सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि आरक्षित वर्ग के वे उम्मीदवार, जिन्होंने सामान्य श्रेणी की कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल किए हैं, उन्हें अनारक्षित (जनरल) सीटों पर समायोजित करना अनिवार्य है।
शीर्ष अदालत ने इस निर्णय को स्थापित कानूनी सिद्धांत बताते हुए कहा कि अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के उम्मीदवार जो मेरिट में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, उन्हें सामान्य श्रेणी का अभ्यर्थी माना जाएगा और उनके लिए संबंधित सामान्य श्रेणी की सीटों पर नियुक्ति की जानी चाहिए।
यह निर्णय देशभर की सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की भर्ती प्रक्रियाओं के लिए मार्गदर्शक साबित होगा और मेधावी आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करेगा।
सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने केरल हाई कोर्ट के 2020 के फैसले को निरस्त करते हुए यह टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने उस समय भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) को निर्देश दिया था कि मेधावी आरक्षित श्रेणी (एमआरसी) के उम्मीदवारों को सामान्य सूची से बाहर किया जाए और एक अन्य अनारक्षित उम्मीदवार की नियुक्ति की जाए।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद स्पष्ट हो गया है कि सिर्फ आरक्षित श्रेणी का दर्जा होने के कारण उच्च अंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी की सीटों से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने इस फैसले को नैतिक और कानूनी दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण बताया।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश भर्ती में मेरिट के महत्व को बढ़ावा देगा और समान अवसर सुनिश्चित करने में मदद करेगा। वहीं, उम्मीदवारों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा, क्योंकि अब किसी भी भर्ती प्रक्रिया में उनकी योग्यता और अंक के अनुसार उन्हें सही वर्ग में समायोजित किया जाएगा।


