स्वच्छता की मिसाल इंदौर में दूषित पानी से मौतें, 20 की जान गई, 3,200 से ज्यादा बीमार

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मध्य प्रदेश का इंदौर शहर, जो लगातार कई वर्षों से देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित होता रहा है, इस समय गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट से जूझ रहा है। भागीरथपुरा और उससे सटे इलाकों में नगर निगम की जल आपूर्ति लाइनों से दूषित पेयजल मिलने के बाद स्थिति भयावह हो गई है। अब तक इस संकट में कम से कम 20 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 3,200 से अधिक लोग बीमार बताए जा रहे हैं।

यह संकट दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में शुरू हुआ और जनवरी 2026 में अपने चरम पर पहुंच गया। दूषित पानी के सेवन से बड़ी संख्या में लोग उल्टी, दस्त, डायरिया और गंभीर डिहाइड्रेशन जैसी बीमारियों की चपेट में आ गए। अस्पतालों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती गई, जिनमें से कई की हालत इतनी गंभीर है कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा है। कई मरीज अब भी जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे हैं।

भारी निवेश के बावजूद व्यवस्था फेल

चौंकाने वाली बात यह है कि इंदौर नगर निगम ने पिछले पांच वर्षों में जल आपूर्ति और स्वच्छता व्यवस्था पर भारी भरकम बजट खर्च किया है। हर साल नगर निगम के कुल बजट का लगभग 25 से 30 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र पर खर्च किया गया।

वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2021-22 में जल संबंधी योजनाओं पर करीब 1,680 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि 2025-26 के लिए यह राशि बढ़ाकर 2,450 करोड़ रुपये प्रस्तावित की गई है। इसी अवधि में नगर निगम का कुल बजट भी 5,135 करोड़ रुपये से बढ़कर 8,200 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है।

इसके अलावा अमृत योजना, स्मार्ट सिटी मिशन और एशियाई विकास बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय परियोजनाओं के तहत भी हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया गया था। इन योजनाओं का उद्देश्य शहरवासियों को 24 घंटे सुरक्षित और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना था। बावजूद इसके, दूषित पानी से फैली यह बीमारी नगर निगम की व्यवस्थाओं और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

अब यह मामला केवल स्वच्छता रैंकिंग का नहीं, बल्कि नागरिकों की जान और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा का बन चुका है।

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