5000 साल पुराना है बंगाल का मशहूर डोकरा आर्ट, मिट्टी के सांचे से निकली है यह सुनहरी कला

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 भारत की पारंपरिक कलाओं में डोकरा आर्ट (Dokra Art) का एक खास स्थान है। यह प्राचीन धातु शिल्प कला पश्चिम बंगाल की सांस्कृतिक पहचान मानी जाती है। खासतौर पर राज्य के बांकुरा जिले में स्थित बिकोना डोकरा ग्राम इस कला का प्रमुख केंद्र है, जहां आज भी कारीगर पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस अनमोल विरासत को संजोए हुए हैं।

लोक संस्कृति, जनजातीय परंपराओं और ग्रामीण जीवन से जुड़ी यह कला न केवल बंगाल बल्कि पूरे देश की धरोहर है। आइए जानें इस कला से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें।

बिकोना डोकरा ग्राम है इसका गढ़

बिकोना डोकरा कलाग्राम पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले में स्थित एक मशहूर हस्तशिल्प गांव है। यह गांव भारत की सबसे पुरानी धातु शिल्प परंपराओं में से एक डोकरा कला का जीवित उदाहरण है। यहां रहने वाले कारीगर सदियों से इसी कला से जुड़े हैं और पारंपरिक तरीकों से धातु की आकर्षक कलाकृतियां तैयार करते हैं। गांव की गलियों में चलते हुए हर घर में इस कला की झलक और मेहनत की खुशबू महसूस की जा सकती है।

हजारों साल पुरानी कला परंपरा

डोकरा कला की जड़ें लगभग 4 से 5 हजार साल पुरानी मानी जाती हैं। यह कला “लॉस्ट वैक्स” तकनीक पर आधारित है, जिसे धातु ढलाई की एक जटिल प्रक्रिया कहा जाता है। इस तकनीक में पहले मोम या मिट्टी से आकृति बनाई जाती है, फिर उस पर मिट्टी की परत चढ़ाकर सांचा तैयार किया जाता है। बाद में सांचे को गर्म करने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है और उसकी जगह पिघली हुई धातु डाली जाती है। ठंडा होने के बाद सांचा तोड़कर तैयार कलाकृति बाहर निकाली जाती है।

पीतल और ब्रॉन्ज का होता है इस्तेमाल

डोकरा कला में मुख्य रूप से पीतल और कांस्य का इस्तेमाल होता है। हाथ से बनाई गई हर आकृति अपने आप में अनोखी होती है, क्योंकि इस प्रक्रिया में एक ही सांचे से दो बिल्कुल समान मूर्तियां बनाना मुमकिन नहीं होता।

देवी-देवताओं से लेकर बैंकुरा घोड़े तक

डोकरा आर्ट की सबसे बड़ी खासियत इसकी थीम है। इसमें देवी-देवताओं की मूर्तियां, मानव आकृतियां, जनजातीय जीवन से जुड़े नजारे, जानवर और पक्षी मुख्य रूप से देखने को मिलते हैं। पारंपरिक बैंकुरा घोड़ा डोकरा कला की पहचान बन चुका है, जिसे शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

इसके अलावा डोकरा कारीगर आभूषण, दीपक, शोपीस, सजावटी वस्तुएं और घरेलू इस्तेमाल का सामान भी बनाते हैं। इन कलाकृतियों में लोक कला की सादगी और जनजातीय भावनाओं की गहराई साफ झलकती है।

देश-विदेश में बढ़ती पहचान

आज डोकरा कला केवल स्थानीय बाजारों तक सीमित नहीं है। बिकोना गांव में बनी कलाकृतियां भारत के अलग-अलह हिस्सों के साथ-साथ विदेशों में भी निर्यात की जाती हैं। हस्तनिर्मित और पारंपरिक होने के कारण इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। यह कला न सिर्फ कारीगरों की आजीविका का साधन है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को भी वैश्विक मंच पर पहुंचा रही है।

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