‘अमीरों के प्रति अर्बन फोबिया’, SC ने क्यों खारिज की पैकेटबंद खाद्य पदार्थों के मानकों पर दायर जनहित याचिका

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर और खाद्य पैकेजिंग में कैंसरकारी रसायनों एंटीमनी और डीईएचपी (डाई(2-एथिलहेक्सिल) फ्थेलेट) की अनुमेय सीमा के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सख्त मानकों को अपनाने की मांग की गई थी। कोर्ट ने इसे ‘अमीरों के प्रति शहरीकृत भय’ बताते हुए इस पर कड़ी टिप्पणी की।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में उन मानदंडों को चुनौती दी गई थी जो एंटीमनी और डीईएचपी जैसे रसायनों की कुछ निश्चित मात्रा की अनुमति देते हैं। ये रसायन प्लास्टिक की पानी की बोतलों और खाद्य पैकेजिंग से रिसकर बाहर आ सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अगुवाई वाली बेंच ने इसे ‘अमीरों का शहरीकृत भय’ करार देते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

क्या था याचिकाकर्ता का दावा?

बता दें कि याचिकाकर्ता ने यह दावा किया कि भारतीय मानक WHO की तुलना में ढीले हैं, जिससे कैंसर, प्रजनन संबंधी समस्याएं और अन्य स्वास्थ्य जोखिम बढ़ते हैं। मांग की गई थी कि FSSAI और BIS मानक संशोधन तक WHO गाइडलाइंस लागू की जाएं और जनता को इनके खतरे के बारे में जागरूक किया जाए।

कई जगहों पर पीने का पानी उपलब्ध नहीं
सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता से देश की वास्तविकता समझने को कहा। उन्होंने कहा कि देश में कई जगहों पर पीने का पानी ही उपलब्ध नहीं है। याचिकाकर्ता को भारत के उन हिस्सों की यात्रा करनी चाहिए जहां पानी पहुंचाना भी चुनौती है।

महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए CJI ने कहा कि गांधीजी ने गरीब इलाकों की यात्रा की थी, याचिकाकर्ता को भी ऐसा करना चाहिए ताकि भारत की सच्चाई समझ आए।

बेंच ने इसे शहरी केंद्रित दृष्टिकोण बताया और कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग भूजल पीते हैं और उन्हें कुछ नहीं होता। कोर्ट ने याचिका सुनवाई के योग्य नहीं मानी, लेकिन याचिकाकर्ता को सरकारी अधिकारियों के समक्ष प्रतिवेदन देने की छूट दी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2006 की धारा 18 का हवाला देते हुए दायर किया गया था, जिसमें अंतरराष्ट्रीय मानकों को ध्यान में रखने की अनिवार्यता है। इसको लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य जोखिम वास्तविक हैं, लेकिन विकासशील देश जैसे भारत में विकसित राष्ट्रों के मानक अंधानुकरण नहीं किए जा सकते।

 

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